Thursday, November 5, 2009

कॉमेडी और रोमांटिक भूमिकाओं में दिखूंगा- नील नितिन मुकेश

नील को उम्मीद है कि जेल में एक्टिंग से वे अभिनय की दुनिया के मंझे खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो जाएंगे। प्रस्तुत है, नील नितिन मुकेश से बातचीत के अंश-
क्या सच है कि आपने पांच थ्रिलर फिल्में करने का प्रण किया था?
हां, मैं खुद को एक्टर के तौर पर साबित करना चाहता था और मेरे हिसाब से थ्रिलर फिल्में बहुत मुश्किल होती हैं। मैंने तय किया कि मैं अपने कॅरियर की शुरूआती पांच फिल्में इसी जॉनर की करूंगा और खुद को साबित करूंगा। जॉनी गद्दार, आ देखें जरा, तेरा क्या होगा जॉनी और न्यूयॉर्क के बाद जेल उस कड़ी की आखिरी फिल्म है। जेल के बाद मैं कॉमेडी और रोमांटिक फिल्मों में दिखाई दूंगा।
जेल में आपको किस अंदाज में देख सकेंगे?
मैं इस फिल्म में पराग दीक्षित की भूमिका निभा रहा हूं। पराग मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का है। उसकी खुशहाल जिंदगी में अचानक एक घटना घटती है और वह जेल के पीछे चला जाता है। मधुर भंडारकर ने इस फिल्म में जेल के पीछे की ऐसी हकीकतें बयां की हैं, जिन्हें देखकर दर्शक हिल जाएंगे। फिल्म में मेरे ओपोजिट मुग्धा गोड्से हैं। यह रियलिस्टिक फिल्म है इसलिए इसमें हमारा लुक भी रीयल रखा गया है। मैंने पराग दीक्षित के किरदार के लिए अपना वजन भी कम किया। जेल को मैं अपने कॅरियर की सबसे मुश्किल फिल्म कहूंगा।
मधुर भंडारकर के निर्देशन में काम करने का अनुभव बताएं?
मधुर भंडारकर सहज एवं सरल स्वभाव के हैं। वे सेट पर हमेशा कूल रहते थे। हमें हर दृश्य बारीकी से समझाते थे। उनका फिल्म मेकिंग का अपना अलग अंदाज है। मैंने उनकी पिछली फिल्में देखी हैं। कबीर खान के बाद मधुर भंडारकर मेरे छोटे से कॅरियर के दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक हैं। मधुर भंडारकर के साथ काम करके मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं।
जेल की कामयाबी तय मानी जा रही है। आप क्या कहेंगे?
जेल मेरी फिल्म है इसलिए मैं तो चाहूंगा कि यह बॉक्स ऑफिस पर सफल हो। यदि लोग अभी से ऐसा मान रहे हैं, तो इससे बढ़कर खुशी की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है। मैं चाहूंगा कि लोग थिएटर में जाकर जेल को देखें।
इसके बाद आपको किन फिल्मों में देखेंगे?
मैं यशराज फिल्म्स की प्रदीप सरकार के निर्देशन में एक फिल्म करने जा रहा हूं। उसमें मेरे साथ दीपिका पादुकोण हैं। न्यूयॉर्क के बाद वह यशराज के साथ मेरी दूसरी फिल्म है। उसके अलावा मैं केन घोष एवं अब्बास मस्तान की फिल्में भी कर रहा हूं।
एक्टिंग के अलावा कुछ नया करने की योजना है?
मुझे अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है इसलिए अपना सारा ध्यान फिल्मों पर लगा रहा हूं। हां, बीच में समय मिलता है तो मैं अपना सिंगिंग शौक पूरा कर लेता हूं।
-रघुवेन्द्र

बिग बॉस 3 के नए सदस्य होंगे प्रवेश राणा

मुंबई। मेरठ के प्रवेश राणा चर्चित रियलिटी शो बिग बॉस 3 के नए सदस्य होंगे। वे शुक्रवार को बिग बॉस के घर में प्रवेश करेंगे। गौरतलब है कि प्रवेश राणा वर्ष 2008 में मिस्टर इंडिया खिताब के विजेता रह चुके हैं। मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता में उन्हें मिस्टर बेस्ट बॉडी, मिस्टर टैलेंटेड और मिस्टर ग्रूवी वॉयस के खिताब से भी पुरस्कृत किया गया था। प्रवेश मॉडलिंग जगत के लोकप्रिय चेहरे हैं। उन्होंने जूम एवं स्टार वन पर कुछ कार्यक्रमों की एंकरिंग भी की है। उल्लेखनीय है कि कलर्स के लोकप्रिय रियलिटी शो बिग बॉस में प्रत्येक वर्ष एक आम आदमी को लिया जाता है। पिछले वर्ष एलिना थीं।
-रघुवेन्द्र सिंह

Wednesday, November 4, 2009

सोचने पर विवश करती है मेरी फिल्में-मधुर भंडारकर

मधुर भंडारकर अपनी प्रत्येक फिल्म से समाज के एक खास वर्ग के कड़वे सच को उजागर करते हैं। चांदनी बार, सत्ता, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिग्नल और फैशन के बाद अब वे नई फिल्म जेल से भारतीय जेलों की हकीकत बयां करने आ रहे हैं। नील नितिन मुकेश और मुग्धा गोडसे अभिनीत जेल के संदर्भ में मधुर भंडारकर ने बातचीत की।

जेल फिल्म बनाने का विचार कैसे सूझा?
जेल फिल्म का विचार काफी सालों से मेरे दिमाग में था। मैं इसे फैशन से पहले बनाना चाहता था, लेकिन कुछ कारणों से मैं इसे तब नहीं बना सका। पांच छह महीने की रिसर्च और नए लेखकों के सहयोग से अब मैं जेल को बनाने में सफल हुआ हूं।
जेल किस तरह की फिल्म है?
यह मधुर की फिल्म है। इसकी अवधि दो घंटे आठ मिनट है। अब तक फिल्मों में लोगों ने लार्जर दैन लाइफ जेल देखा था, लेकिन मेरी फिल्म में पहली बार लोग रीयल जेल देखेंगे। यह मीडिल क्लास लड़के पराग दीक्षित की कहानी है। उसकी कहानी के जरिए मैंने जेल के पीछे की सच्चाई दिखायी है। ठाणे और पूना की जेल इसकी पृष्ठभूमि है। नितिन चन्द्रकांत देसाई ने जेल का बहुत अच्छा सेट डिजाइन किया है।
आपकी फिल्म में कितना प्रतिशत सच होता है और कितनी प्रतिशत कल्पना?
सत्तर प्रतिशत सच और तीस प्रतिशत कल्पना के मिश्रण से मेरी फिल्में बनती हैं। जेल में भी सच और कल्पना का इसी मात्रा में मिश्रण है।
जेल के लिए नील नितिन मुकेश और मुग्धा गोडसे को आपने क्यों चुना?
मैं हमेशा फिल्म के सब्जेक्ट के हिसाब से कलाकारों का चयन करता हूं। लोग हमेशा पूछते हैं कि आप स्टार कलाकारों के साथ काम क्यों नहीं करते? मेरी कहानी में स्टार फिट ही नहीं होते। पराग दीक्षित के किरदार के लिए मुझे ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो किसी इमेज में न बंधा हो। नील नितिन मुकेश मुझे स्यूटेबल लगे। वे बहुत टैलेंटेड हैं। मुग्धा ने फैशन में प्रियंका चोपड़ा और कंगना राणाउत की उपस्थिति में अपनी अलग पहचान बनाई। जेल से ये दोनों कलाकार बहुत आगे जाएंगे।
अपने सिनेमा को किस विधा में रखेंगे?
मैंने बीच की धारा का सिनेमा अपनाया है। मेरी फिल्मों को क्रिटकली और कामर्शियली सफलता मिलती है। तीन बार मुझे राष्टीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मैं अपने सिनेमा को समाज का आइना कहूंगा। मेरा सिनेमा समाज में जागरण पैदा करता है। साल्यूशन नहीं देता, लेकिन ऐसी चीजें सामने रखता है जो लोगों को सोचने पर विवश करती हैं।
क्या आप रियलिस्टिक फिल्ममेकर की पहचान से खुश हैं?
मैं खुश हूं, क्योंकि मैं कहीं जाता हूं तो लोग अपनी समस्याएं लेकर मेरे पास आते हैं। लोगों को विश्वास हो गया है कि मैं यदि किसी समस्या पर फिल्म बनाऊंगा तो लोग उसे देखेंगे, लेकिन अब मुझे खुद को रिइन्वेंट करने की जरूरत है। मैं एक प्रकार के सिनेमा से बंधकर नहीं रहना चाहता। अब मैं फिल्म मेकिंग का अपना स्टाइल बदलूंगा। मैं कॉमेडी और रोमांटिक फिल्में बनाना चाहता हूं।
जेल के बाद कौन सी फिल्म बनाएंगे?
अभी मैंने कुछ तय नहीं किया है। अवॉर्ड और क्रिकेट पर फिल्म बनाने की खबर अफवाह है।
-रघुवेन्द्र सिंह

Tuesday, November 3, 2009

पा फिल्म में ऐसे दिखेंगे अमिताभ बच्चन

अमिताभ बच्चन अपनी नयी फिल्म पा में पोजेरिया बीमारी से ग्रस्त बच्चे की भूमिका निभा रहे हैं। इस बीमारी में दस-बारह साल का बच्चा साठ-सत्तर का लगने लगता है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को उम्रदराज दिखाने के लिए विशेष मेकअप का करना पड़ा था। इसके लिए हॉलीवुड से ऑस्कर विजेता मेकअप आर्टिस्ट क्रिस्तियान को बुलाया गया था। अमिताभ बच्चन ने बताया किइस मेकअप को करने में चार-पांच घंटे लगते थे और मेकअप उतारने में डेढ़-दो घंटे लगते थे। इस फिल्म की शूटिंग और मेकअप का अनुभव मेरे लिए बिल्कुल नया और अलग रहा। इसे प्रोस्थेटिक मेकअप कहते हैं। इसमें आर्टिस्ट का चेहरा बदल जाता है। अमिताभ बच्चन इस फिल्म के प्रति काफी उत्साहित हैं।
-अजय ब्रह्मात्मज

समाज को कुछ वापस देना चाहता हूं: शाहरूख खान | खबर

मुंबई। सोमवार को शाहरूख खान ने अपना 44वां जन्मदिन परिवार एवं करीबी दोस्तों के साथ सादगी से मनाया। उन्होंने रात को अपने बंगले मन्नत में छोटी सी डिनर पार्टी का आयोजन किया था। जन्मदिन के मौके पर मन्नत में बातचीत में शाहरूख खान ने कहा, मैं भले ही चवालीस साल का हो गया हूं, लेकिन आज भी मैं पच्चीस साल का युवा महसूस करता हूं। हां, शारीरिक चोटों की वजह से कभी-कभी महसूस होता है। शाहरूख ने कहा कि यह साल उनके लिए फिजीकली बहुत बुरा लेकिन इमोशनली अच्छा रहा। शाहरूख के अनुसार, कंधे की चोट के कारण मैं ज्यादा काम नहीं कर सका। केवल एक फिल्म माई नेम इज खान की। मैं अधिकतर समय घर में रहा और अपने परिवार के साथ समय बिताया। उससे मुझे बहुत खुशी मिली। लेकिन खुशी की बात यह है कि एक साल के ब्रेक की वजह से अब मेरे अगले दो साल पैक रहेंगे। मेरी कंधे की चोट अब अच्छी हो रही है। अब मैं जमकर काम करूंगा। मैं वर्क होलिक हूं। मैं काम से अपनी उम्र गिनता हूं।
गौरतलब है कि शाहरूख खान के बंगले मन्नत केबाहर जन्मदिन की रात से प्रशंसकों की भारी भीड़ इकट्ठा थी। शाहरुख की एक ऑस्ट्रेलियन फैन ने तो उनके जन्मदिन के मौके पर चांद पर जमीन खरीदकर उन्हें तोहफे में भेंट की। शाहरूख ने बताया कि उनका नाम सैंडी है। उन्होंने बताया किस्कॉटलैंड में भी उनकी ऐसी ही फैन हैं, जो उनकेजन्मदिन पर उनके नाम जमीन खरीदती है। शाहरूख खान ने ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहा, ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया। मुझे शानदार जिंदगी दी और अच्छे लोगों के साथ काम करने का मौका दिया। मुझे लोगों का खूब प्यार मिला। मैं लोगों के चेहरे पर स्माइल लाने में सफल रहा। वही मेरी उपलब्धि है। मैं बहुत खुश हूं। इस जन्मदिन पर मैं अपने परिवार एवं शुभचिंतकों की अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं।
शाहरूख खान को अभिनय में आए बीस साल हो चुके हैं। इन बीस सालों में उन्होंने सफलता और शोहरत की बुलंदी छुई है। शाहरूख को जो कुछ मिला है, उसके बदले वे अब समाज को कुछ देना चाहते हैं। शाहरूख खान का कहना है, मैं बीस साल पहले जब मुंबई आया था तब मेरे मन में स्ट्रांग फीलिंग थी कि मैं बिग स्टार बनूंगा। अब बीस साल बाद मेरे अंदर यह स्ट्रांग फीलिंग है किमैं बच्चों, युवाओं, शिक्षा और इन्वायरमेंट के लिए कुछ करना चाहता हूं। मैं एंटरटेनमेंट में बहुत कुछ करना चाहता हूं। लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया है। उसके बदले मैं समाज को कुछ वापस देना चाहता हूं। मैं बच्चों के लिए सुपरहीरो वाली एक फिल्म करना चाहता हूं। शाहरूख खान को अपने जन्मदिन पर तोहफों का विशेष तौर से इंतजार रहता है। शाहरूख ने बताया, मेरी बेटी रविवार को गिफ्ट देगी। उसने हिंट दिया है कि वह मेरे लिए एंजिल्स ऑन दि मून करके कुछ बना रही है। बेटा शरारती है। वह कोई पुस्तक देगा। करण जौहर ने मुझे सत्तर इंच का लैपटॉप बैग और एक जोड़ी जूते गिफ्ट में दिए हैं। शाहरूख खान ने बताया कि उनकी पत्नी उन्हें जन्मदिन पर कोई तोहफा नहीं देती। शाहरूख के अनुसार, गौरी कहती हैं कि जिसके पास सब कुछ है, उसे क्या देना?
शाहरूख खान ने बताया कि वे जल्द ही फौजी सीरियल के रीमेक में अभिनय करते दिखाई देंगे। शाहरूख के अनुसार, मैं फौजी के पहले एपीसोड में दिखाई दूंगा। मैं सीरियल को एन्ट्रोड्यूज करूंगा। शाहरूख खान ने जानकारी दी कि उनकी पुस्तक अगले दो महीने में पूरी हो जाएगी। उनकी पुस्तक का नाम ट्वेंटी ईयर्स ऑफ ए डिकेड है। उन्होंने बताया कि उनकी नई फिल्म माई नेम इज खान फरवरी में प्रदर्शित होगी।
-रघुवेन्द्र सिंह

Monday, November 2, 2009

दिलवाले.. की उम्र हुई 14 साल | आलेख

"कम, फॉल इन लव..दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का यह उपशीर्षक आज भी अपने चुंबकीय आकर्षण से दर्शकों को खींच रहा है। निर्देशक आदित्य चोपड़ा और शाहरुख खान-काजोल के लिए तो जैसे मुंबई के मराठा मंदिर में पिछले चौदह वर्ष से वक्त ठहरा हुआ है। आदित्य निर्देशित डीडीएलजे ने पहली बार 20 अक्टूबर, 1995 को सिनेमाघरों में दस्तक दी थी। शुरुआत में फिल्म को साधारण सफलता मिली, लेकिन वक्त के साथ मधुर संगीत और सरल कहानी के कारण इसने दर्शकों को अपने मोह-पाश में बांधना शुरू किया। परिणाम यह हुआ कि साधारण कही जाने वाली दिलवाले दुल्हनिया.. भारतीय सिनेमा की असाधारण फिल्मों की सूची में शुमार हो गई। लगभग चौदह वर्ष बाद भी यह फिल्म मुंबई के मराठा मंदिर में दर्शकों को अपनी ओर खींच रही है।
जादू है या नशा: भारतीय मूल्यों की बातें धीमे और सूक्ष्म स्वर में कहने वाली इस फिल्म को देखते वक्त आज भी सीटियां बजती हैं, तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। लगभग तीन पीढि़यों का मनोरंजन करने वाली दिलवाले.. का मधुर संगीत आज भी झूमने को मजबूर कर देता है। शाहरुख और काजोल के भावपूर्ण अभिनय और भारतीय संस्कृति की झलक पाने के लिए आज भी दर्शक टीवी चैनलों पर इसके प्रसारण का इंतजार करते हैं। छोटे पर्दे पर इस फिल्म को देख रहे नई पीढ़ी के दर्शकों को मलाल रहता है कि वे बड़े पर्दे पर इस ऐतिहासिक फिल्म को देखने से वंचित रह गए। हालांकि मुंबई वासियों के लिए तो पिछले चौदह वर्षो से बड़े पर्दे पर इस क्लासिक फिल्म को देखने का अवसर उपलब्ध है। सुखद आश्चर्य है कि चौदह वर्ष बाद भी मराठा मंदिर में दिलवाले.. देखने आए दर्शकों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह फिल्म का जादू है या नशा.., कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि भारतीय सिनेमा के सुनहरे सफर में मील का पत्थर बन चुकी है दिलवाले..। उल्लेखनीय है कि इस फिल्म से पूर्व मिनर्वा थिएटर में शोले पांच साल और अशोक कुमार अभिनीत किस्मत मुंबई और कोलकाता के सिनेमाघरों में तीन साल तक लगातार चली थी।
मराठा मंदिर, इतिहास और वर्तमान: 1958 में स्थापित मराठा मंदिर मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से चंद कदम दूर स्थित है। यह अपनी खूबसूरत स्थापत्य कला और गौरवशाली इतिहास के कारण मुंबई की हेरिटेज इमारतों की सूची में शुमार हो चुका है। इसके मुख्य संचालक प्रवीण विठ्ठल राणे बताते हैं, पहली बार मुगल-ए-आजम हमारे सिनेमाघर में दो साल चली थी। हर दिन उसके चार शो होते थे। उस वक्त की तकनीक और दर्शकों का नजरिया अलग था। बदलते वक्त के साथ हमारे सिनेमाघर में भी नई तकनीक का प्रयोग किया जाने लगा। सिनेमास्कोप और साउंड सिस्टम में डिजिटिल और डॉल्वी तकनीक का प्रयोग हो रहा है। अब तो मराठा मंदिर का नाम जल्द ही गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉ‌र्ड्स में दर्ज हो जाएगा। दिलवाले.. पिछले चौदह वर्षो से हमारे सिनेमाघर में चल रही है। सबसे ज्यादा समय तक किसी सिनेमाघर में दिखाई जाने वाली फिल्म बन गई है यह। मराठा मंदिर सिंगल स्क्रीन थिएटर है। स्क्रिन की ऊंचाई चौबीस फीट और चौड़ाई पचास फीट है। बैठने की व्यवस्था भी आरामदायक है। यहां कम पैसे में फिल्म देखी जा सकती है। यदि सुबह 11:30 बजे दिलवाले.. देखना है, तो बालकनी में बैठकर फिल्म का आनंद लेने के लिए बाईस रुपये और ड्रेस सर्किल में बैठने के लिए बीस रुपये खर्च करने होंगे। नई फिल्मों के टिकट दर अलग हैं।
चौदह साल का सुहाना सफर: समीक्षकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के अभाव में दिलवाले.. शुरुआत में अधिक व्यवसाय नहीं कर पाई। ऐसा देश के हर सिनेमाघरों के साथ-साथ मराठा मंदिर में भी हुआ था। मराठा मंदिर के मुख्य संचालक प्रवीण विठ्ठल राणे बताते हैं, पहले सप्ताह में दिलवाले.. नहीं चली थी। कम दर्शक आते थे। दूसरा सप्ताह शुरू होते ही दर्शकों की संख्या में बढ़ोतरी होने लगी। कम-से-कम आठ-दस हफ्ते तक हाउस फुल रही। दो महीने तक इसका कलेक्शन हमारे सिनेमाघर में 92 से 95 प्रतिशत तक रहा। एक महीने बाद सुबह के शो में इस फिल्म को चलाने का निर्णय लिया। पांच से छह साल तक कलेक्शन 80 प्रतिशत के नीचे गया ही नहीं। उसके बाद साठ प्रतिशत कलेक्शन हो गया। आज भी इसका कलेक्शन पचास से साठ प्रतिशत होता है। मराठा मंदिर में दिलवाले.. के चौदह साल के सफर के गवाह हैं जगजीवन मारू। हेड प्रोजेक्शन ऑपरेटर मारू ने अपनी आंखों के सामने दिलवाले.. को हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म बनते देखा है। वे कहते हैं, मराठा मंदिर में चालीस साल से हूं।
दिलवाले.. का पहला शो मैंने ही रन किया था और आज चौदह साल बाद भी इसकी जिम्मेदारी मेरी ही है। उस समय इतने सारे टीवी चैनल नहीं थे। फैमिली के साथ लोग इसे देखने आते थे। आज तो सभी अकेले आते हैं। मुझे तो फिल्म पूरी तरह याद हो गई। लगभग साढ़े चार हजार शो मैंने रन किए हैं।
बाइस रुपये, विदेशी नजारे: मराठा मंदिर में दिलवाले.. के सुहाने सफर के पीछे कई रोचक बातें छिपी हैं। दरअसल, इसके करीब ही मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन और महाराष्ट्र राज्य परिवहन का डिपो स्थित है। ऐसे में जिन मुसाफिरों की ट्रेन या बस दो-से-तीन घंटे देर होती है, वे मराठा मंदिर जाकर बाईस रुपये में दिलवाले.. देखना घर वापस जाने या किसी महंगे रेस्टोरेंट में समय बिताने से बेहतर समझते हैं। पिछले चौदह साल से मराठा मंदिर में कार्यरत वैष्णव बताते हैं, यहां ज्यादातर आसपास रहने वाली पब्लिक ही आती है। कई लोगों के चेहरे तो जाने-पहचाने हो गए हैं। हमारे यहां दिलवाले.. के शो का टिकट रेट काफी कम है। ऐसे में, बाईस रुपये में दर्शकों को तीन घंटे एसी में बैठने का मौका, विदेश के नजारे और साथ में ढेर सारा मनोरंजन मिल जाए, तो वे खींचे तो आएंगे ही।
दिल अभी भरा नहीं : फिल्म दिलवाले.. को जितनी बार देखो, दिल नहीं भरता। इसी एक बार के चक्कर में पचीस वर्षीय पायल खान फिल्म को अनगिनत बार देख चुकी हैं। पति के साथ मराठा मंदिर से फिल्म देखकर बाहर निकलीं पायल बताती हैं, पहले मैं अकेले इसे देखने आती है। आठ साल पहले जब मैंने इसे पहली बार देखा था, तब मैं राज को ढूंढती थी। अब अपने राज के साथ इस फिल्म को देखने आती हूं। सांताक्रूज निवासी अट्ठारह वर्षीय भोला बताते हैं, मैंने टीवी पर इस फिल्म को कई बार देखा है, लेकिन थिएटर में देखने का मजा अलग है। मैं अब तक पांच बार इसे देख चुका हूं। मैं राज की तरह बनना चाहता हूं।

-raghuvendra/Somya

भारत के आखिरी सुपरस्टार हैं शाहरूख

सबके चहेते शाहरूख खान दो नवंबर को जीवन के नए बसंत में प्रवेश कर रहे हैं। उनके आकर्षक व्यक्तित्व, मधुर वाणी, मिलनसार स्वभाव और प्रभावी अभिनय की प्रशंसक सारी दुनिया है। यह तो शाहरूख की मीडिया द्वारा स्थापित छवि है, लेकिन क्या हिंदी सिनेमा के इस सुपर स्टार के व्यक्तित्व का कोई और पहलू भी है? बता रहे हैं मुश्ताक शेख, जो शाहरूख खान के अंतरंग मित्र हैं। शाहरूख खान के ऊपर उन्होंने दो पुस्तकें शाहरूख कैन और स्टिल रीडिंग खान लिखी हैं।
निजी जीवन में शाहरूख खान मेरी और आपकी तरह साधारण इंसान हैं। वे खुद को कभी गंभीरता से नहीं लेते और न ही मीडिया द्वारा मिलने वाली अटेंशन को गंभीरता से लेते हैं। वे घर में कैजुअली रहते हैं। उनके घर का माहौल रीयल होता है। वे न तो खुद और न ही अपने किसी करीबी द्वारा घर में स्टार की तरह बर्ताव करना पसंद करते हैं। घर में यदि कोई उन्हें मजाक में भी स्टार की तरह ट्रीट करता है तो वे नाराज हो जाते हैं।
शाहरूख बाहर के काम को घर के भीतर नहीं लाते। यह नियम उन्होंने स्वयं बनाया है। वे जब घर में होते हैं तो सारा समय आर्यन, सुहाना और गौरी को देते हैं। वे आर्यन के साथ गेम खेलते हैं। यदि सुहाना ने कोई कविता लिखी है तो उसे पढ़ते हैं। आर्यन और सुहाना का होमवर्क करवाते हैं। शाहरूख को इससे ज्यादा खुशी दुनिया की किसी चीज से नहीं मिलती। वे कंप्लीट फैमिली मैन हैं।
भारतीय मूल्यों, आदर्शो और संस्कारों में शाहरूख खान दिल से यकीन करते हैं। वे भाई, पति, पिता, अभिनेता की अपनी सभी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाते हैं। यही वजह है कि वे हमेशा खुश एवं संतुष्ट नजर आते हैं। वे कभी रिश्तों का मखौल नहीं उड़ाते। ऐसा वे समाज को ध्यान में रखकर नहीं करते कि लोग क्या कहेंगे? यह उनके मिजाज में है। शाहरूख की उम्र बहुत कम थी, जब उनके माता-पिता चल बसे। वे परिवार की वैल्यू जानते हैं इसीलिए अपने परिवार को संगठित रखते हैं।
शाहरूख में ईष्र्या या बदले की भावना नहीं है। उनके शब्दकोश में यह शब्द ही नहीं है। शाहरूख ऐसी शख्सियत है जो दूसरों में ईष्र्या पैदा कर देता है। शाहरूख में हमेशा जीतने का जज्बा रहता है। यू नेवर विन द सिल्वर, यू लूज द गोल्ड.वे इस कहावत में यकीन करते हैं। शाहरूख हमेशा जीतने के लिए खेलते हैं। वे जीतने के लिए जी-जान लगा देते हैं। उन पर हार का असर नहीं पड़ता। शाहरूख सही मायने में पठान हैं।
शाहरूख का एक ही लक्ष्य है, जीवन के अंतिम समय तक काम करते रहना। वे मानते हैं कि इंसान की पहचान उसके काम से होती है। अपने काम से ही इंसान निरंतर आगे बढ़ता रहता है। आज भी मैं शाहरूख की फिल्म के सेट पर जाता हूं तो उनमें वही जोश देखता हूं जो दिल आशना है और बाजीगर फिल्म के सेट पर रहा होगा। वे काम से बोर नहीं होते। कैमरा ऑन होते ही वह अपना दो हजार प्रतिशत देते हैं। कंधा दुख रहा है या ऑपरेशन हुआ है, इस चीज से उन्हें फर्क नहीं पड़ता। शाहरूख के लिए काम सर्वोपरि है। वे कहते रहते हैं कि ऊपर वाला काम में उनकी रूचि यूं ही बनाए रखे।
शाहरूख खान भले ही उम्र की दहलीज पर दहलीज पार करते जा रहे हैं, लेकिन उनके अंदर आज भी दस साल का एक बच्चा है। आप उन्हें कोई गिफ्ट दें तो उसके रैपर को वे दस साल के बच्चे की तरह फाड़ते हैं। अगर आप लुत्फ उठाना चाहते हैं तो शाहरूख को सात-आठ रैपर लगाकर गिफ्ट दे दें। उसका रैपर फाड़ते वक्त उनका उत्साह देखने लायक होता है। अपने जन्मदिन पर मिलने वाले गिफ्ट को लेकर वे बहुत उत्सुक रहते हैं। उन्हें गिफ्ट खोलते हुए देखने का अलग ही मजा है।
शाहरूख खान भारत के आखिरी सुपरस्टार हैं। आजकल के सुपर स्टार फास्टफूड की तरह हैं। हर फ्राइडे को एक नया सुपरस्टार पैदा हो जाता है। मुझे नहीं लगता कि आने वाले समय में कोई शाहरूख खान की ऊंचाइयों और उपलब्धियों को टच कर पाएगा।
-रघुवेन्द्र सिंह