Friday, February 27, 2009

अब टेंशन बहुत है: इमरान हाशमी/ बचपन

इमरान हाशमी मुंबई में पले-बढ़े हैं। नन्हीं उम्र में वे बहुत शैतान थे। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वे बड़े होकर अभिनेता बनेंगे। उनकी पहली फिल्म 'फुटपाथ' वर्ष 2003 में प्रदर्शित हुई। अब उनकी पहचान लोकप्रिय एवं सफल अभिनेता की है। इमरान सप्तरंग के पाठकों को बता रहे हैं अपने बचपन की नटखट बातें-
[शैतान बच्चा था]
मेरा बचपन बेहद खुशनुमा माहौल में बीता है। मैं अपने मम्मी-पापा का इकलौता बेटा हूं। नन्हीं उम्र से ही मेरी हर सुख-सुविधा का ख्याल रखा जाता रहा। मैं बचपन में जिस चीज की मांग करता था वह तुरंत मेरे सामने लाकर रख दी जाती थी। सबके लाड़-प्यार की वजह से मैं बिगड़ गया था। मैं घर का सबसे शैतान बच्चा था।
[मुस्कान थी ढाल]
मैं घर का ही नहीं, बिल्डिंग का भी सबसे शरारती बच्चा था। एक बार मैंने बिल्डिंग के पिछवाड़े में आग लगा दी थी। फायर ब्रिगेड बुलानी पड़ी थी। पता है? उतनी बड़ी घटना के बावजूद मुझे मार नहीं पड़ी। मैं मासूम मुस्कुराहट से सबका दिल जीत लेता था। लाख शरारतों के बाद भी कभी मुझ पर किसी ने हाथ नहीं उठाया।
[शामिल था टॉप टेन में]
मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। सच कहूं तो मैंने दिल लगाकर कभी पढ़ाई नहीं की, लेकिन मेरे मा‌र्क्स कभी शर्मिन्दगी वाले नहीं आए। मैं अपनी हर कक्षा में टॉप टेन में आता था। मैं अपने मम्मी-पापा के पैसे की इज्जत करता था। उसी बात का ध्यान रखकर मैं थोड़ी-बहुत पढ़ाई कर लेता था। खेल में मुझे क्रिकेट और फुटबाल पसंद था। दोस्तों के साथ मैं यही दोनों खेल खेलता था।
[अभी नहीं हुआ बड़ा]
मुझे नहीं लगता कि मैं अभी बड़ा हुआ हूं। हां, बचपन की ईमानदारी और सच्चाई अब मुझमें नहीं रही। अब दिल भी साफ नहीं रहा। सच कहूं तो बचपन के दिन सबसे अच्छे थे। अब टेंशन बहुत है। बचपन के बिंदास दिनों को मैं मिस करता हूं।
[सम्मान और अनुशासन सीखें]
बचपन में सब सोचते हैं कि जल्दी से स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जाए, फिर कॉलेज जाएं। हम सभी जल्दी से बड़ा होना चाहते हैं। मैं बच्चों से कहना चाहूंगा कि वे जिन दिनों को जल्दी से बिता देना चाहते हैं, वहीं जिंदगी के सबसे बेहतरीन दिन हैं। उन्हें एंज्वॉय करें। बड़ों की इज्जत करना और अनुशासित जीवन जीना सीखें।
[रघुवेंद्र सिंह]

Thursday, February 26, 2009

हर फिल्म है दिल के करीब: रेहान खान | मुलाकात

अभिनेता रेहान खान ने 2006 में रोमांटिक फिल्म जाना -लेट्स फॉल इन लव से ऐक्टिंग व‌र्ल्ड में रखा था। उसके बाद वे फिल्म आवारापन में मेहमान भूमिका में दिखे। अब रेहान की अंजुम रिजवी निर्मित फिल्म फास्ट फारवर्ड आएगी। वे इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेखक-निर्देशक शाहरुख मिर्जा के बेटे हैं रेहान, जिन्होंने कसमें वादे और धनवान जैसी लोकप्रिय फिल्में लिखी थीं। पिछले दिनों रेहान से बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं, उसके अंश..
फास्ट फारवर्ड किस तरह की फिल्म है?
यह डांस की लोकप्रिय विधा हिप-हॉप पर आधारित है। कहानी दो डांस ग्रुप की है। एक अमीर लड़कों का सिद एन ग्रुप है और दूसरा गरीब लड़कों का ऋषि एन है। अलग फेम अक्षय कपूर इसमें सिद्धार्थ की भूमिका में हैं। मैं इसमें मुंबई के नाला सोपारा इलाके में रहने वाले युवक ऋषि की भूमिका निभा रहा हूं, जो गरीब है। ऋषि गुमनामी के अंधेरे से कैसे चमकती दुनिया का हिस्सा बनता है, यह एक दिलचस्प किस्सा है। फिल्म का खास आकर्षण हिप-हॉप डांस है। इसमें विनोद खन्ना और महेश मांजरेकर भी हैं। इसमें मेरे अॅपोजिट कोई हीरोइन नहीं है। बस कुछ पल के लिए मुझे अंजना सुखानी का साथ मिला है।
हिप-हॉप डांस की मुश्किल विधा है। क्या आपने इसका प्रशिक्षण लिया था?
हमारी ट्रेनिंग के लिए अमेरिका से डांस टीचर बुलाए गए थे। वाकई हिप-हॉप बहुत मुश्किल डांस है। ट्रेनिंग के दौरान मुझे बहुत परेशानी हुई। मैंने श्यामक डावर से डांस सीखा है। उनसे डांस सीखने का मेरा अनुभव सुखद रहा। हिप-हॉप हमारे लिए चुनौती थी।
इस फिल्म को अपने करियर के लिए कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?
यह फिल्म मेरी पहली फिल्म की तरह बेहद खास है। वैसे, मैं हर फिल्म को दिल के करीब रखता हूं, लेकिन इन दिनों छोटी-छोटी फिल्में करके आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। मेरे पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। मेरे पिता आज होते, तो मुझे आगे बढ़ते देख कर बहुत खुश होते। वे चाहते थे कि मैं बड़ा ऐक्टर बनूं। सच तो यह है कि यदि फिल्म सफल होती है, तो निश्चित ही मेरे करियर को लाभ मिलेगा।
आप संगीत सिवन की क्लिक और कबीर सदाना की फिल्म तुम मिलो तो सही भी कर रहे हैं?
हां। संगीत की फिल्म में मैं मेहमान भूमिका में हूं। उसमें श्रेयस तलपड़े मुख्य भूमिका में हैं। संगीत मेरे मित्र हैं, इसलिए मैंने उनकी फिल्म की। कबीर की तुम मिलो तो सही में मैं मुख्य भूमिका में हूं। यह एक रोमांटिक फिल्म है। उसमें नाना पाटेकर, डिंपल कपाडि़या, सुनील शेट्टी, विद्या मालवदे और अंजना सुखानी भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे।
फास्ट फारवर्ड में विनोद खन्ना और कबीर की फिल्म में नाना पाटेकर, डिंपल कपाडि़या और सुनील शेट्टी जैसे सीनियर कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
सब में एक बात समान थी कि ये जैसे दिखते हैं, हकीकत में वैसे हैं नहीं। नाना गुस्सैल दिखते हैं, लेकिन वे नरमदिल इनसान हैं। सीनियर कलाकारों में बड़प्पन साफ झलकता है। सभी ने मुझे प्रोत्साहित किया। मैं लकी हूं कि मुझे करियर के शुरुआती दिनों में ही इन कलाकारों के साथ काम करने का अवसर मिला।
इनके अलावा कोई और फिल्म भी कर रहे हैं?
कबीर सदाना से बात चल रही है। उनकी अगली फिल्म में मैं नजर आऊंगा। इस साल एक के बाद एक मेरी सभी फिल्में प्रदर्शित होंगी। यदि उनमें मेरे काम की सराहना हुई, तो निश्चित ही कुछ और फिल्में साइन करूंगा।
-रघुवेंद्र सिंह

Saturday, February 21, 2009

हमेशा आता था मेरिट लिस्ट में नाम: हरमन बावेजा/बचपन

फिल्मकार हैरी बावेजा के लाड़ले बेटे हरमन ने बचपन में ही तय कर लिया था कि उन्हें बड़ा होकर एक्टर बनना है। वे इस लक्ष्य के प्रति निरंतर प्रयासरत रहे और आज उनकी गिनती नयी पीढ़ी के उभरते अभिनेताओं में की जाती है। हरमन ने यह पहचान फिल्म 'लव स्टोरी 2050' और 'विक्ट्री' से हासिल की है। फिल्मी गलियारे में पले-बढ़े हरमन इस स्तंभ में बता रहे हैं अपने नटखट बचपन के बारे में-
[दुलारा रहा मम्मी-पापा का]
मैं बचपन में ज्यादा शरारती नहीं था। मेरी बहन रोवेना बहुत शरारतें करती थी। सच कहूं तो मेरे हिस्से की शरारत भी वही करती थी। यही वजह है कि मार भी उसको ही पड़ती थी। मैं मम्मी-पापा का अच्छा बच्चा था। वे मुझे खूब दुलार करते थे। मेरी हर इच्छा को पूरा करते थे। मम्मी-पापा ने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया। उन्होंने हमेशा मुझे प्यार ही किया और मैंने भी उनके लाड़-प्यार का कभी नाजायज फायदा नहीं उठाया। मैंने उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। मैं आज भी मम्मी-पापा का लाड़ला हूं।
[पढ़ाई में होनहार था]
मैं पढ़ने में बहुत तेज था। गणित मेरा मनपसंद विषय था। मेरा नाम मेरिट लिस्ट में हमेशा आता था। उसके लिए स्कूल-कॉलेज से लेकर घर तक मुझे वाहवाही मिलती थी। मम्मी-पापा और रोवेना सब मेरा उत्साह बढ़ाते थे। मैं खेलकूद में भी समान रूप से तेज था। यही वजह है कि मेरी बॉडी इतनी फिट है। मैंने अब तक जो काम किए हैं, उनमें हमेशा अव्वल रहा हूं। अब एक्टिंग में भी वही मुकाम बनाना चाहता हूं।
[कमाल के दिन थे बचपन के]
मैं बचपन के दिनों को बहुत मिस करता हूं। वे दिन कमाल के होते थे। न तो काम की टेंशन होती थी और न ही किसी तरह की जिम्मेदारी होती थी। लवस्टोरी 2050 के प्रदर्शन के बाद मुझे पहली बार लगा कि अब मैं बड़ा हो गया हूं। अचानक मुझे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होने लगा। दरअसल लवस्टोरी 2050 के प्रदर्शन के पहले मैं सिर्फ मम्मी-पापा का बेटा था, लेकिन उसके बाद दुनिया की नजर मुझ पर टिक गयी। मैंने एक-एक कदम फूंक कर रखना शुरू कर दिया।
[खूब खेलें और खूब पढ़ें]
बड़े होने के अपने फायदे हैं, लेकिन बचपन की बात निराली है। मैं बच्चों से यही कहूंगा कि वे जल्दी बड़े होने की न सोचें। खूब खेलें और दिल लगाकर पढ़ाई करें। हां, शैतानी करने से बचें। बचपन के हर पल को एंज्वॉय करें, क्योंकि वह मजा फिर जिंदगी के किसी पड़ाव में नहीं मिलता। मम्मी-पापा की छांव का भरपूर लुत्फ उठाएं। उनकी बातों को ध्यान से सुनें क्योंकि वही बातें बाद में जिंदगी के सफर में काम आती हैं। कुछ ऐसा काम करें कि आपके मम्मी-पापा का सिर गर्व से ऊंचा उठ जाए।
[रघुवेंद्र सिंह]

Thursday, February 19, 2009

तमिल व तेलुगू में बनेगी ए वेडनसडे | खबर

मुंबई। लोकप्रिय अभिनेता एवं फिल्म-निर्माता कमल हसन हिन्दी भाषा की सफल फिल्म ए वेडनेसडे का तमिल और तेलगू वर्जन बनाने जा रहे हैं। कमल हसन ने यह जानकारी मुंबई में चल रहे फिक्की फ्रेम्स 2009 में दी। वे यहां फोकस ऑन साउथ सेमिनार में हिस्सा लेने आए थे। उन्होंने ए वेडनेसडे के निर्माताओं से फिल्म के अधिकार खरीद लिए हैं। कमल हसन के अनुसार, ए वेडनेसडे के तमिल और तेलगू वर्जन में नसीरूद्दीन शाह वाली भूमिका मैं स्वयं करूंगा। मुझे इस फिल्म का विषय बहुत अच्छा लगा और साथ ही, इसने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा व्यवसाय किया। हम इसे नए निर्देशक के साथ बना रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि कमल हसन ने कुछ वर्ष पूर्व गोविंद निहलानी की लोकप्रिय फिल्म द्रोहकाल का भी तमिल वर्जन बनाया था। अगले वर्ष कमल हसन अभिनय के पचास वर्ष पूरे कर रहे हैं। कमल कहते हैं, अगले वर्ष एक्टिंग में मेरे पचास वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, मैं इस मौके को सेलिब्रेट करूंगा। अपने प्रशंसकों और दर्शकों का शुक्रिया अदा करूंगा और एक नई ऊर्जा के साथ पुन: अभिनय की दुनिया में रम जाऊंगा।
-रघुवेन्द्र सिंह

अब छोटे बजट की फिल्में बनाएंगे करण | खबर

मुंबई। लार्जर देन लाइफ सिनेमा के लिए प्रसिद्ध युवा फिल्मकार करण जौहर अब छोटे बजट की फिल्मों का निर्माण करेंगे। बुधवार को फिक्की फ्रेम्स 2009 में द नेक्स्ट बिग थिंग इन फिल्म एंड टेलीविजन विषय पर आधारित सेमीनार में करण जौहर ने कहा, हर व्यवसाय की भांति हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर भी आर्थिक मंदी का असर पड़ा है। इससे उबरने का सबसे अच्छा तरीका छोटे बजट की फिल्मों का निर्माण करना है।
हाल में पांच-छह करोड़ रुपये की लागत से बनी ए वेडनेसडे, ओए लकी लकी ओए और फिल्म देव डी की बॉक्स ऑफिस सफलता ने निर्माताओं के लिए आशा की नई किरण दिखा दी है। मैं स्वयं अब छोटे बजट की फिल्मों का निर्माण करने जा रहा हूं। मैं नए निर्देशकों और नए कलाकारों के साथ फिल्में बनाने की योजना बना रहा हूं। मुझे लगता है कि 2009 में छोटे बजट की फिल्मों के बाजार का विस्तार होगा।
ज्ञात हो, करण जौहर आजकल शाहरुख खान और काजोल के साथ फिल्म माई नेम इज खान बना रहे हैं। शाहरुख खान की अस्वस्थता की वजह से उनकी फिल्म की शूटिंग रूकी हुई है। करण जौहर ने आगे कहा, अब फिल्म निर्माता एवं कॉरपोरेट कंपनियां बहुत सोच-समझकर पैसे खर्च कर रहे हैं। मेरे होम प्रोडक्शन की अयान मुखर्जी निर्देशित फिल्म वेक अप सिद बड़े बजट की फिल्म नहीं है। भले ही उसमें रणबीर कपूर और कोंकणा सेन शर्मा जैसे कलाकार हैं।
-रघुवेंद्र सिंह

Wednesday, February 18, 2009

धमाकेदार वापसी करूंगी: नौहीद | मुलाकात

अभिनेत्री नौहीद सायरसी अपने बीते कल से भले ही नाखुश हैं, लेकिन वे अपने आने वाले कल को लेकर काफी उत्साहित हैं। वे वर्ष 2009 को अपने लिए बेहद लकी मान रही हैं। दरअसल, फिल्म किसान के बाद उन्होंने हाल में सोहेल खान प्रोडक्शन की एक और फिल्म साइन की है। नौहीद के मुताबिक, इतना ही नहीं, मैंने करण जौहर के प्रोडक्शन की भी एक फिल्म साइन की है। हाल में नौहीद की फिल्म आसमां आई थी। पिछले दिनों तरंग ने किए उनसे तीन सवाल।
पिछली सभी फिल्मों की तरह आपकी नई फिल्म आसमां भी बॉक्स-ऑफिस पर असफल हो गई। इसकी आप क्या वजह मानती हैं?
मैं फिल्में सोच-समझकर साइन करती हूं। अच्छी फिल्मों के लिए ही हां करती हूं। पता नहीं, कैसे वे बॉक्स-ऑफिस पर फ्लॉप हो जाती हैं। शायद मेरा नसीब ही अच्छा नहीं है। अब तक का सफर बिल्कुल अच्छा नहीं रहा। मैं पीछे पलटकर देखती हूं, तो निराशा होती है, लेकिन हिम्मत नहीं हारूंगी। मैं धैर्य के साथ काम कर रही हूं। देखती हूं, सफलता कब तक मुझसे भागती है!
पहले की अपेक्षा अब आप मीडिया के बीच कम रहती हैं। ऐसा क्यों?
अब मैं अपने काम पर ध्यान देने लगी हूं। दरअसल, पहले मैं बहुत बढ़-चढ़कर बात करती थी और बाद में मुझे पछताना पड़ता था। मेरी बातें जब सच नहीं होती थीं, तो निराशा होती थी। बेवजह चर्चा में रहने से नुकसान होता है। प्रशंसकों के बीच छवि खराब होती है, सो अलग इसीलिए मैंने तय किया है कि अब सिर्फ काम के सिलसिले में ही मीडिया से बात करूंगी। लोग काम से पहचानें, तो ज्यादा अच्छा लगेगा।
अभिनय में अपने भविष्य को कितना उज्ज्वल देखती हैं?
मेरा आने वाला कल बहुत सुनहरा और सुखद होगा। मैंने सोहेल खान प्रोडक्शन की दो फिल्मों के साथ ही करण जौहर के होम प्रोडक्शन की भी एक फिल्म साइन की है। आजकल उसी फिल्म की शूटिंग कर रही हूं। इन से अलग मैं गौतम अधिकारी की लव का तड़का और ईशान त्रिवेदी की बैचलर पार्टी भी कर रही हूं। इन फिल्मों से मैं धमाकेदार तरीके से वापसी करूंगी। मेरी आने वाली फिल्में मुझे अलग पहचान देंगी। मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी। लोग मेरा काम देखेंगे।
-रघुवेंद्र सिंह

Monday, February 16, 2009

मैं कल्याणी जैसी नहीं हूं: सुरेखा सिकरी

बालिका वधु की परंपरावादी और रूढि़वादी विचारों वाली कल्याणी दादी का गुस्सा जब फूटता है तो मासूम आनंदी, जगदीश एवं गहना के साथ ही, टीवी से चिपक कर बैठे हजारों दर्शक भी सहम जाते हैं। चंद मिनट बाद वही कल्याणी दादी जब मुस्कुराती है तो सबके चेहरे पर भी हल्की सी मुस्कान दौड़ जाती है। यह असर देसी लिबास में सजी-धजी छोटे पर्दे की कल्याणी दादी का है। सुरेखा को गोविंद निहलानी की तमस और श्याम बेनेगल की फिल्म मम्मो में सराहनीय अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
बालिका वधु साइन करते समय क्या आपको अनुमान था कि यह सीरियल इस कदर लोकप्रिय होगा?
मुझे नहीं लगा था कि बालिका वधु इतना बड़ा हिट साबित होगा। मेरे पास जब सीरियल का प्रस्ताव आया और मैंने कल्याणी की भूमिका के बारे में सुना तो मुझे यह अलग और दमदार लगी। मैंने अपने लंबे करियर में निगेटिव भूमिका नहीं की थी। सो, मैंने हां कह दिया।
कल्याणी दादी की भूमिका निभाना कैसा लग रहा है?
मैंने अपने जीवन में अब तक ऐसी महिला नहीं देखी। कल्याणी देहाती है। उसकी सोच, बातचीत, पहनावा-ओढ़ावा, बैठने-उठने का तरीका अलग है। मैं कल्याणी को कल्पना के आधार पर जी रही हूं। सच कहूं तो मुझे इस भूमिका के लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती। सब अपने आप हो जाता है। अब लोग मिलते हैं तो कहते हैं कि आपके जैसी यानी कल्याणी जैसी मेरी नानी, दादी और सास हैं। ये सुनकर मुझे खुशी होती है। साथ ही डर भी लगता है कि मेरी भूमिका का किसी पर निगेटिव असर न पड़ जाए। मैं चाहूंगी कि लोग कल्याणी से अच्छी बातें सीखें।
क्या कल्याणी की तरह आप भी परंपरावादी सोच रखती हैं?
मैं कल्याणी जैसी नहीं हूं। मैं रीयल लाइफ में सीधी-सादी एक मामूली महिला हूं। हां, मुझे कल्याणी की कुछ बातें पसंद हैं और मैं उनसे निजी जीवन में सरोकार रखती हूं। मैं मानती हूं कि बच्चों को टीवी अधिक नहीं देखना चाहिए, उन्हें अपनी सेहत का ख्याल रखना चाहिए और खूब खाना-पीना चाहिए। लड़कियों को घर के काम अच्छी तरह सीखने चाहिए। आज की लड़कियां करियर को ज्यादा महत्व देती हैं। वे घर का काम-काज नहीं सीखती हैं। यदि वे ये सब काम सीखेंगी तो उन्हीं का लाभ होगा।
2005 में आयी फिल्म जो बोले सो निहाल के बाद आप बड़े पर्दे पर नहीं दिखीं। क्या वजह है?
मैंने हॉलीवुड की फिल्म फैमिली पोर्टेट साइन की थी। पता नहीं क्यों वह फिल्म रिलीज नहीं हुई। उसके बाद अच्छी भूमिकाओं के प्रस्ताव ही नहीं मिले। मैं टीवी में व्यस्त हो गयी। अब बालिका वधु की लोकप्रियता के बाद मुझे अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिल रहे हैं। लेकिन इस वक्त मैं कोई फिल्म नहीं कर सकती, क्योंकि मैं एक समय में एक ही काम करना पसंद करती हूं।
आपके निजी जीवन के बारे में जानना चाहेंगे। यहां तक का सफर कैसे तय किया?
मेरा बचपन उत्तर भारत के कुमायूं में बीता। कुछ दिनों तक मैं अलीगढ़ में रही। अट्ठारह वर्ष की उम्र में दिल्ली आ गयी। 1968 में मैंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से ग्रेजुएशन पूरा किया। दस वर्षो तक वहीं थिएटर में व्यस्त रही। मेरे काम की सराहना हुई तो टीवी और फिल्मों में काम करने के प्रस्ताव मिलने लगे। 1987 में मैं मुंबई आ गयी। यहां आने के बाद थिएटर से रिश्ता टूट गया। खुशकिस्मत रही, शुरुआती दिनों में ही गोविंद निहलानी और श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों के साथ काम करने का मौका मिला। मेरा अब तक का सफर अच्छा रहा है।
थिएटर को मिस करती हैं? नए कलाकारों के लिए ट्रेनिंग कितनी आवश्यक है?
थिएटर का अनुभव मुझे टीवी एवं फिल्म में बहुत काम आया। थिएटर में काम करने के बाद कलाकार मंझ जाता है। उसे कहानी, भूमिका और अभिनय की समझ आ जाती है। टीवी में फटाफट शॉट देना पड़ता है। यहां रिहर्सल के लिए वक्त नहीं मिलता। थिएटर पृष्ठभूमि की होने की वजह से मैं अपने डायलॉग और सीन याद रख पाती हूं। मेरे मुताबिक ट्रेनिंग लेनी चाहिए। वहां आपको टेक्नीक सिखायी जाती है। मैं तो आज भी सीख रही हूं, बालिका वधु के अपने नन्हें कलाकार आनंदी और जगदीश से।
-रघुवेंद्र सिंह