Thursday, February 24, 2011

सपना हो रहा है पूरा-रतन राजपूत

रतन राजपूत जब दिल्ली में थिएटर में थीं, तब अक्सर उन्हें नौकरानी या दूसरे किस्म के साधारण किरदार निभाने के लिए दिए जाते थे। नाटक का हीरो उन्हें तवज्जो नहीं देता था। इसका कारण रतन का साधारण लुक और दुबली-पतली काया थी, लेकिन वही रतन जब जी टीवी के सीरियल अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो की लाली के रूप में प्रसिद्ध हुई तो उनके चाहने वालों की संख्या असंख्य हो गई। बहुत जल्द एक राष्ट्रीय चैनल पर अब वही रतन देश भर से आए नवयुवकों में से अपने लिए वर का चुनाव करेंगी। रतन के लिए यह गर्व का पल है। वे कहती हैं, मेरे पिता कमिश्नर हैं। उनका सिर किसी के सामने नहीं झुकता, लेकिन एक बेटी के पिता के तौर पर मैंने उन्हें सिर झुकाते देखा है। मैं पांच बहनों में सबसे छोटी हूं। स्वयंवर रचाकर मैं पिताजी को बेटा होने का अहसास कराऊंगी। पहली बार बेटी का बाप होने के बावजूद उनका सिर मेरी शादी में नहीं झुकेगा।
रतन ने पटना से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई का सफर तय करके अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो से अभिनय जगत में सम्मान अर्जित कर छोटे शहर की लड़कियों की प्रेरणा बन गई। उनके द्वारा इमेजिन चैनल पर रियलिटी शो स्वयंवर 3 : रतन का रिश्ता के जरिए अपने लिए पति ढूंढना एक ऐतिहासिक कदम है। दुनिया हैरत में है। रतन आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, इसमें हैरानी की क्या बात है! हर लड़की के जीवन में यह पड़ाव आता है। मैं बहुत खुश हूं। सीता जी मिथिलांचल से थीं। उनका स्वयंवर हुआ था। मैं भी मिथिलांचल से हूं और अब मेरा स्वयंवर होने जा रहा है। मैं बहुत उत्साहित हूं। मैं खुश हूं कि मुझे अपना वर चुनने का मौका मिल रहा है। आज के जमाने में कितनी लड़कियों को ऐसा मौका मिलता है? शादी मेरे बचपन का सपना था। मेरा वह सपना पूरा होने जा रहा है।
रतन के स्वयंवर की तैयारियां इन दिनों जोर-शोर से चल रही है। वे बैठकर सब देख रही हैं। इस बाबत रतन कहती हैं, अरे भाई लड़की की शादी होती है, तो वह खुद काम थोड़े ही करती है। मैं बैठकर सारी तैयारियां देख रही हूं। इमेजिन के लोग तैयारियां कर रहे हैं। रतन के मन में आजकल अनेक प्रकार की भावनाएं उमड़ रही हैं। कैसे-कैसे लड़के आएंगे? क्या उन्हें उनके सपनों का राजकुमार मिलेगा? रतन कहती हैं, मैं बहुत नर्वस हूं। मुझे डर भी है कि कहीं लोग लाली को ढूंढते हुए मेरे स्वयंवर में न आ पहुंचें। गौरतलब है कि रतन ने अपने परिवार और रिश्तेदारों की सहमति के बाद रियलिटी शो में स्वयंवर करने का फैसला किया है।
रतन को केयरिंग, सपोर्टिव, इंडिपेंडेंट और दूसरों का सम्मान करने वाला लड़का चाहिए। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता की लड़का गांव से है या शहर से। रतन कॉन्फिडेंट हैं कि स्वयंवर का असर उनके करियर पर नहीं पड़ेगा। उनका कहना है, मैं शादी करने के बाद एक्टिंग को भूल नहीं जाऊंगी। दर्शकों को इससे क्या फर्क पड़ेगा कि रतन शादीशुदा है या नहीं। मैं पॉजिटिव सोचती हूं। देखते हैं कि शादी के बाद क्या होता है? रतन मानती हैं, इंसान ऊपर वाले के हाथ की कठपुतली है। वह जैसे नचाएगा, वैसे नाचना पड़ेगा। वैसे, जो होगा, अच्छा होगा, मैं इसी बात में यकीन करती हूं। मैं अपने स्वयंवर को लेकर पॉजिटिव हूं। मुझे आशा है कि मेरा जीवनसाथी शो में मिल जाएगा।
-रघुवेंद्र सिंह

शाहिद की बर्थडे पार्टी में प्रियका को नहीं बुलावा

शाहिद कपूर की गर्लफ्रेंड हैं प्रियका चोपड़ा। जाहिर है कि शाहिद की जिंदगी में प्रियका की खास जगह है, इसके बावजूद शाहिद की बर्थडे पार्टी का निमत्रण प्रियका चोपड़ा को नहीं मिला है। मिली जानकारी के मुताबिक शाहिद के खास दोस्तों ने उनके लिए 24 फरवरी की रात सरप्राइज बर्थडे पार्टी देने की योजना बनाई है। यह पार्टी शाहिद के फिल्म इंडस्ट्री के दोस्त नहीं, बल्कि उनके गैर फिल्मी दोस्त दे रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने इस पार्टी में शाहिद कपूर की गर्लफ्रेंड प्रियका चोपड़ा को आमत्रित नहीं किया है। वे शाहिद के तीसवें जन्मदिन को अलग ढंग से सेलीब्रेट करना चाहते हैं। शाहिद के दोस्त नहीं चाहते हैं कि उनके बीच फिल्म इंडस्ट्री के लोग मौजूद हों।
गौरतलब है कि पच्चीस फरवरी, 1981 को पैदा हुए शाहिद कपूर का कल जन्मदिन है। पच्चीस फरवरी का दिन शाहिद अपने परिवार और मित्रों के सग व्यतीत करेंगे। शाहिद के लिए यह साल बेहद खास है। इस साल पिता पकज कपूर निर्देशित उनकी फिल्म 'मौसम' रिलीज होगी। जिसे लेकर शाहिद बेहद उत्साहित हैं। हमारी ओर से शाहिद कपूर को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं!



देसी कुड़ी कंगना

आनद एल राय निर्देशित 'तनु वेड्स मनु' फिल्म की सफलता को लेकर कंगना निश्चित हैं। कंगना आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, 'तनु वेड्स मनु' अच्छी फिल्म है और अच्छी फिल्म को चलने से कोई नहीं रोक सकता है।'
गौरतलब है कि 'तनु वेड्स मनु' में कंगना ने कानपुर की तनुजा त्रिवेदी की भूमिका निभाई है। तनुजा उर्फ तनु बेहद चचल, स्मार्ट और इंटेलीजेंट है। वह अपने अंदाज में जिंदगी जीती है। इस किरदार में कंगना पहली बार देसी अवतार में नजर आएंगी। कंगना कहती हैं, 'अब तक दर्शकों ने मुझे मॉडर्न ड्रेस में देखा था। इसमें मैंने शुद्ध भारतीय ड्रेस पहने हैं। मैंने सलवार-कमीज पहनी है। मेरा लुक फिल्म का एक विशेष आकर्षण है।'
'तनु वेड्स मनु' में कंगना रनौत के साथ आर माधवन हैं। 'वस अपॉन अ टाइम इन मुंबई', 'नॉकआउट' और 'नो प्रॉब्लम' जैसी फिल्मों के बाद 'तनु वेड्स मनु' जैसी फिल्म, जिसमें कोई स्टार अभिनेता नहीं है, में काम करने की वजह क्या रही? इस सवाल पर कंगना कहती हैं, 'मैं हीरो का हाथ पकड़कर नहीं चलती हूं। मैं हीरो देखकर या बड़ा निर्देशक देखकर फिल्म साइन नहीं करती हूं। यदि मुझे भरोसा है कि फिल्म चलेगी, स्क्रिप्ट अच्छी है, निर्देशक अच्छे हैं, तो मैं काम करती हूं। आनद की यह दूसरी फिल्म है, लेकिन मुझे उनकी स्क्रिप्ट अच्छी लगी, इसलिए मैंने उनके साथ काम किया। 'तनु वेड्स मनु' में जयमाल लेकर खड़ी कंगना निजी जीवन में कब तक शादी करेंगी? जवाब में कंगना कहती हैं, 'मुझे अब तक ऐसा कोई मिला ही नहीं है, जिसके साथ घर बसा सकूं। फिलहाल मैं अपने काम में बिजी हूं।'
इधर पिछले कुछ समय से कंगना ने अपने कॅरियर का रुख बदल दिया है। अब वह कॉमेडी फिल्मों को तरजीह दे रही हैं। कंगना बताती हैं, 'आजकल मैं डेविड धवन की फिल्म 'रासकल' की शूटिंग कर रही हूं। यह भी कॉमेडी फिल्म है। इसके अलावा मैं इन्द्र कुमार की कॉमेडी फिल्म 'डबल धमाल' कर रही हूं। 'तनु वेड्स मनु' भी रोमाटिक कॉमेडी है। मुझे कॉमेडी फिल्मों की शूटिंग में मजा आ रहा है। खास बात यह है कि कॉमेडी फिल्मों का दर्शक वर्ग बहुत बड़ा है। इन फिल्मों से मेरी लोकप्रियता बढ़ेगी। मेरी पहचान का दायरा बड़ा होगा।
आनद एल राय निर्देशित यह फिल्म दो विपरीत स्वभाव के लोगों की कहानी है। मनोज शर्मा उर्फ मनु सीधा-सादा लड़का है। लदन में रहने के बावजूद वह अरेंज मैरिज में विश्वास करता है। परिवार के कहने पर मनु लदन से कानपुर अपने लिए लड़की देखने आता है। तनुजा त्रिवेदी उर्फ तनु चचल, शरारती, लेकिन समझदार और बुद्धिमान लड़की है। वह दुनिया के नियम-कानून नहीं मानती। अरेंज मैरिज में उसका यकीन नहीं है। विपरीत स्वभाव के तनु और मनु की शादी क्या होगी और यदि होगी तो कैसे? यह देखना रोचक होगा। इसकी शूटिंग कानपुर और पजाब के कुछ शहरों में हुई है। निर्माता शैलेश सिह तनु वेड्स मनु के बारे में कहते हैं कि लबे समय के बाद भारत का असली रंग और मि˜ी की खुशबू इस फिल्म में मिलेगी। फिल्म के गीतकार हैं राजशेखर और सगीतकार हैं कृष्णा। कंगना और आर माधवन के साथ मुख्य भूमिकाओं में है जिमी शेरगिल, स्वरा भास्कर, दीपक डोबरियाल आदि।
-रघुवेन्द्र सिह

Friday, February 18, 2011

कच्चा लिंबू- किशोरावस्था की उलझनें

मुख्य कलाकार : ताहिर सुतरवाला, चिन्मय कांबली विनय पाठक, रुखसार, इरावती हर्षे, भैरवी गोस्वामी, अतुल कुलकर्णी, राजेश खट्टर

निर्देशक : सागर बल्लारी

तकनीकी टीम : निर्माता- सीमांतो रॉय, संगीत- अमरदीप निज्जर

किशोरावस्था में प्रवेश करते समय एक लड़के के जीवन में कई बदलाव होते हैं। खास तौर से स्वतंत्र सोच का निर्माण, लड़कियों की ओर आकर्षण, दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने की ललक।
कच्चा लिंबू फिल्म का केंद्रीय पात्र तेरह वर्षीय शंभू व्यक्तित्व निर्माण के इसी रचनात्मक दौर से गुजर रहा है। वह स्कूल में ढेर सारे दोस्त बनाना चाहता है, अपनी नृत्य प्रतिभा का प्रदर्शन करना चाहता है, लंच ब्रेक में दूसरे स्कूल में जाकर एक लड़की को छुपकर निहारता है, लेकिन शंभू का दोस्त कोई नहीं बनना चाहता। सब उससे दूर भागते हैं। उससे नफरत करते हैं। उसकी हीरो बनने की कोशिश हर बार फेल हो जाती है। शंभू घर में भी अकेला है। उसकी मम्मी ने दूसरी शादी की है। वह न तो मम्मी और न ही पापा से मन की बात कहता है। अंत में शंभू घर छोड़कर भाग जाता है। कोलीवाड़ा में उसकी मुलाकात विट्ठल से होती है। विट्ठल अनपढ़ है, लेकिन बिंदास है। वह किसी से दबता और डरता नहीं। विट्ठल और शंभू गहरे दोस्त बन जाते हैं। नन्हा विट्ठल अपने घर के झगड़ों से परेशान होकर शंभू के साथ घर छोड़कर भाग जाता है। शंभू और विट्ठल अभिभावकों के मित्रतापूर्ण व्यवहार और उचित मार्गदर्शन से वंचित हैं।
शंभू और विट्ठल के किरदार को ताहिर सुतरवाला और चिन्मय कांबली ने सुंदरता से निभाया है। मोटे शंभू के रूप में सागर बल्लारी ऐसे पात्र को केंद्र में लाए हैं, जो अमूमन फिल्मों में गौण रहा है। सागर का यह साहस सराहनीय है। किशोरावस्था की उलझनों और रोचक बदलावों को सहज और संवेदनशील तरीके से वे पेश करने में सफल हैं। वे इंगित करते हैं कि किशोर बच्चों को अभिभावकों के स्नेह के साथ मित्रवत व्यवहार की बहुत जरूरत होती है। शंभू का चरित्र स्थापित होने के बाद भी सागर का चरित्र निर्माण के लिए बार-बार साधारण घटनाओं का जोड़ फिल्म को लंबा एवं उबाऊ बना देता है। लंबे-लंबे संवाद मराठी भाषा में रखने से लेखक-निर्देशक को बचना चाहिए था।
-ढाई स्टार
-रघुवेन्द्र सिंह


Monday, February 14, 2011

मेरा परफेक्ट वैलेंटाइन

आजकल की युवा पीढ़ी को 'परफेक्ट वैलेंटाइन' की तलाश होती है, जिनके साथ 'वैलेंटाइन डे' के दिन कुछ मधुर, खुशनुमा और प्यार-भरे पल बिताकर अपने प्रेम-संबंध को गहराई दे सकें। सिल्वर स्क्रीन के कुछ सितारों को तो उनका हमसफर मिल गया है, पर कुछ अभी भी अपने 'परफेक्ट वैलेंटाइन' की तलाश कर रहे हैं।

मेरी फैमिली का सम्मान करे: रणबीर कपूर

सबसे पहले जरूरी है कि मेरी वैलेंटाइन एक अच्छी ह्यूमन बीइंग हो। वह मेरी फैमिली का सम्मान करे। मैं सिर्फ उससे उम्मीद नहीं करूंगा। उसकी उम्मीदों पर भी खरा उतरने की कोशिश करूंगा। उम्र और रंग-रूप मेरे लिए बहुत अधिक मायने नहीं रखता है। मेरा मानना है कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती है। मैंने तय किया है कि जब मुझे प्यार होगा, तभी मैं शादी करूंगा।

मुझे खुश रखे: दीपिका पादुकोण

फिल्म स्टार की लाइफ बेहद कठिन होती है। त्याग और समझौते करने पड़ते हैं। मेरा 'परफेक्ट वैलेंटाइन' वही होगा जो मुझे और मेरे प्रोफेशन की जरूरतों और मजबूरियों को समझते हुए मुझे जीवन की छोटी-छोटी खुशियां दे पाए। मेरी लाइफ में सक्सेस और मनी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। छोटी-छोटी चीजें मुझे खुश करती हैं। मैं चाहूंगी कि मेरा वैलेंटाइन मेरी भावनाओं को समझे। एक और बात मैं बेहद व्यवस्थित रहती हूं तो उसे भी मेरी तरह व्यवस्थित और अनुशासित होना चाहिए।

जो सरल और सहज हो: रजत बरमेचा

मैं चाहता हूं कि मेरी वैलेंटाइन स्वभाव से घरेलू हो जो मेरे परिवार में घुल-मिल जाए और उन्हें अपना बना ले। वह सरल हो और सहज हो। सबसे खास बात कि वह वर्किंग हो ताकि जब हम रिलेशनशिप में आगे बढ़ें तो उसे मेरी व्यस्तता से प्रॉब्लम न हो। वह भी अपने कॅरियर पर फोकस करे। वह भी व्यस्त रहे। मैं 21 का ही हूं, तो अभी मेरे पास अपनी 'परफेक्ट वैलेंटाइन' ढूंढ़ने के लिए काफी वक्त है।

मेरे लिए कविताएं लिखे: कट्रीना कैफ

आज के जवान लड़के-लड़कियां दोस्त होते हैं। समय बीतने और साथ रहने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वे प्रेमी हैं। मैं चाहती हूं कि मेरा वैलेंटाइन सबसे पहले मेरा अच्छा दोस्त हो। मुझे पता है कि प्यार का दूसरा नाम दर्द है, पर मेरा नजरिया पॉजिटिव है। मुझे लगता है कि प्यार जीवन का सबसे खूबसूरत एहसास है, जो मुझे यह एहसास दिला सके। वही मेरी नजर में मेरा परफेक्ट वैलेंटाइन है। एक और बात किसी ने मेरे लिए आज तक कविता नहीं लिखी है। अगर वह मेरे लिए कविता लिखेगा, तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।

मिल गया परफेक्ट वैलेंटाइन: सेलिना जेटली

जो संस्कारी हो, जिसमें ग्रेट सेंस ऑफ ह्यूंमर हो, मेरे मम्मी-पापा को रिस्पेक्ट दे तथा लंबा और हैंडसम हो, वही मेरे वैलेंटाइन हो सकता है। मुझे काले और गोरे से फर्क नहीं पड़ता। खुशी की बात है कि मुझे मेरा परफेक्ट वैलेंटाइन मिल गया है। मुझे ये सारी खूबियां मेरे मंगेतर पीटर हाग में मिल गयी हैं। इसलिए मैंने उनके साथ सितंबर में शादी करने का फैसला कर लिया है।

मेरे पापा की तरह हो: सोनम कपूर

चाहती हूं कि मेरा वैलेंटाइन मेरे पापा की तरह स्मार्ट, इंटेलीजेंट, केयरिंग और समझदार हो। फैमिली वैल्यूज में उसका यकीन हो। हां, एक बात और है उसकी मूंछें मेरे पापा की तरह ही होनी चाहिए। उसमें मुझे मेरे पापा की छवि दिखनी चाहिए। मुझे पता है कि ऐसे लड़के की तलाश करना मुश्किल है। फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।

सौम्या अपराजिता/रघुवेन्द्र सिंह

Saturday, February 12, 2011

मैं सबसे प्यार करती हूँ-प्रियंका चोपड़ा

विशाल भारद्वाज की फिल्म 7 खून माफ में प्रियंका चोपड़ा जिंदगी से लबालब और इश्क से मायूस सुजैना का रोल कर रही हैं, जो प्यार के मामले में खानाबदोश है। सुजैना सात मर्दो से शादी करती है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में इतना अनूठा किरदार पहली बार आ रहा है। इस किरदार को पर्दे पर जीने का मौका पाकर प्रियंका खुश हैं। वे कहती हैं, मैं बहुत लकी हूं कि मुझे 7 खून माफ फिल्म मिली। मुझे विशाल भारद्वाज के साथ दोबारा काम करने का मौका मिला। सुजैना अलग तरह की लड़की है। ऐसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी। यह किसी के जीवन से प्रेरित नहीं है। सुजैना की अपनी दुनिया है। यह काल्पनिक किरदार है, इसलिए इसके साथ हम जो कर सकते थे, हमने किया।

विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म 7 खून माफ रस्किन बांड की शॉर्ट स्टोरी पर आधारित है। इसमें प्रियंका पहली बार पचीस वर्ष की युवती से लेकर साठ वर्ष की वृद्धा के लुक में नजर आएंगी। यह फिल्म सुजैना के जीवन का सफर है। यह सुजैना के सच्चे प्यार की खोज की कहानी है। प्रियंका मानती हैं कि यह किरदार निभाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। उनके अनुसार, सुजैना कहती है कि दुनिया के सारे गलत आदमी मेरी ही किस्मत में थे। टफ कैरेक्टर है यह। इसमें मेरे कई लुक हैं। मेरा लुक डिजाइन करने के लिए हॉलीवुड से मेकअप आर्टिस्ट बुलाए गए थे। उन्होंने मुझसे मेरे नानी, मां की तस्वीरें मांगी और उस हिसाब से मेरा लुक बनाया। फिजीकली इसमें मेरा लुक मॉम से प्रेरित है।

जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह, इरफान खान, अन्नू कपूर, ऐलेक्जेंडर और विवान शाह ने 7 खून माफ में प्रियंका के सात पतियों की भूमिका निभाई है। प्रियंका ने जॉन अब्राहम से लेकर नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह और अपने से कम उम्र के नवोदित अभिनेता विवान के साथ अंतरंग दृश्य किए हैं। उनके अंतरंग दृश्यों की काफी चर्चा भी हो रही है। इस बाबत प्रियंका कहती हैं, शादी के बाद क्या स्त्री पति के साथ इंटीमेंट नहीं होती। सुजैना के अपने पतियों के साथ ऐसे दृश्य हैं। मैं आर्टिस्ट हूं और फिल्म करते समय मैं कैरेक्टर में रहती हूं। अपनी सहूलियत के हिसाब से मैं इस तरह के दृश्य करती हूं। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।

7 खून माफ में नसीरुद्दीन शाह, अन्नू कपूर और इरफान खान जैसे बेहतरीन कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव प्रियंका बांटती हैं, मैं बहुत नर्वस थी। नसीर सर के साथ मैंने शूटिंग के पहले वर्कशॉप की थी। वे अपने आप में एक्टिंग का इंस्टीट्यूशन हैं। इरफान खान के साथ मैंने इस फिल्म का पहला शेड्यूल किया था। तब मेरे कैरेक्टर की उम्र चालीस थी। इस फिल्म का पूरा अनुभव मेरे लिए रोमांचक और यादगार रहा।

विशाल भारद्वाज मानते हैं कि प्रियंका चोपड़ा अपने दौर की बेहतरीन अभिनेत्री हैं। वे हार्ड वर्किग और समर्पित हैं। प्रियंका के साथ उनका जो रैपो बना है, वैसा रैपो आज तक किसी कलाकार के साथ नहीं बना। अपने निर्देशक से अपने लिए ऐसी बातें सुनकर प्रियंका विनम्रता से सिर नीचे झुका लेती हैं। वे सिर्फ मुस्कुराती हैं और अपने आपको बहुत लकी कहती हैं। 7 खून माफ प्रियंका के करियर की बेहतरीन फिल्म मानी जा रही है। प्रियंका कहती हैं, मैंने बहुत मेहनत की है। मुझे फिल्म की शूटिंग के दौरान बहुत मजा आया। उम्मीद है कि दर्शकों को फिल्म पसंद आएगी। इसमें ब्लैक कॉमेडी है। बहुत चूमरस फिल्म है। प्रियंका की इस फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है, लेकिन उनका मानना है कि इससे फिल्म के बिजनेस पर असर नहीं पड़ेगा। वे कहती हैं, मेरी फिल्म फैशन को भी ए सर्टिफिकेट मिला था, लेकिन वह चली। प्रियंका खुद को आशिक मिजाज मानती हैं। वे दार्शनिक अंदाज में कहती हैं, मैं सबसे प्यार करती हूं। मैं दुनिया के हर शख्स से प्यार करती हूं। पर यह सुनकर अजीब लगता है कि प्रियंका शाहिद कपूर को आज भी अपना सच्चा दोस्त ही मानती हैं। वे कहती हैं, सचमुच, शाहिद मेरे दोस्त ही हैं और कुछ नहीं..।

Friday, February 11, 2011

अवॉर्ड तो मैं ले लूंगा लेकिन: अक्षय कुमार


कॉमेडी फिल्मों से अक्षय कुमार ब्रेक ले रहे हैं। वे बदलाव चाहते हैं। जुहू में अपने नए दफ्तर में अक्षय ने अपनी नई योजनाओं, पटियाला हाउस और 2011  की व्यस्तताओं  के बारे में गंभीरता से बातचीत की।

पटियाला हाउस के प्रोमो  और गीत के लिए व्यक्तिगत तौर पर कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है?
बहुत अच्छा  रिस्पांस है। लोगों को जब गाना पसंद आता है तो म्यूजिक कंपनी खुश हो जाती है। गाने बहुत खास रोल प्ले करते हैं क्योंकि जब गाने चल जाते हैं तो मैंने देखा है कि फिल्म अच्छी  न भी हो तो गानों की वजह से फिल्म निकल जाती है। मैंने फिल्म देखी है। मैं कह सकता हूं कि तीन-चार साल बाद कॉमेडी से दूर होकर मैंने एक इमोशनल  और सीरियस  फिल्म की है। मेरे लिए एक जगह  से दूसरी जगह  आने जैसा है। मैंने जान-बूझकर ऐसा किया है क्योंकि मैंने बहुत कॉमेडी फिल्में कीं। मैं बदलाव चाहता था।
आप इमोशनल  फिल्म क्यों करना चाह रहे थे?
काफी पहले मैंने फादर-सन रिलेशन पर फिल्म की थी। एक रिश्ता, फिर वक्त की थी। जानवर भी की। उसके बाद वापस मैं पटियाला हाउस में उस विषय को ला रहा हूं।
आपको लगता  है कि री विजिट  करने का समय आ गया है?
वो तो करना ही चाहिए। हर इंसान को कुछ न कुछ नया करना चाहिए इसलिए मैंने यह किया। काफी लोग मुझसे कहते थे कि कॉमेडी से ब्रेक लेकर कुछ अलग करिए तो मुझे यही मिला। स्क्रिप्ट मुझे अच्छी  लगी।  इस स्क्रिप्ट में जो है, हर हिंदुस्तानी की जिंदगी  में ऐसा होता है। परिवार के अंदर समस्या होती है। बेसिकली  एक पिता है जिसका खुद का सपना है कि उसका बेटा क्या बने? वह उसे वही बनाना चाहता है, लेकिन उसके बेटे का ड्रीम  कुछ और है। ऐसे बहुत घरों में होता है, लेकिन डैडी मैं नहीं बनना चाहता हूं डॉक्टर। पैरेंट्स  भूल जाते हैं कि बच्चों  के अपने सपने होते हैं। मैंने देखा है कि आज की जेनरेशन के बीच में बहुत होता है कि हम कुछ बनना चाहते हैं और पिता कुछ बनाना चाहते हैं। यह ज्वाइंट फैमिली की कहानी है इसीलिए इसको पटियाला हाउस कहते हैं। पटियाला मतलब होता है बड़ा। पटियाला पैक कहते हैं तो बड़ा पैक कहते हैं इसीलिए पटियाला हाउस मतलब बड़ी फैमिली। 24  लोग रहते हैं साथ और उसमें हमारे जो बाबूजी  हैं उनका कहना मानना पड़ता है। परिवार में जो बच्चों  के ड्रीम  हैं, वह शैटर  होते जा रहे हैं। बाबूजी  चाहते हैं कि वो उनके मन का करें और ऐसा बहुत जगहों  पर होता है।
संयुक्त परिवार के माहौल को मिस करते हैं मुबंई  में?
ज्वाइंट फैमिली का मजा ही कुछ और है। मैं खुद जब दिल्ली में रहता था तो बीस से बाइस जन साथ रहते थे। मामा-मामी, मम्मी-डैडी सब लोग साथ रहते थे और हमारा घर भी दो बेडरूम का था। हम बाइस लोग साथ रहते थे। उसका मजा कुछ और होता था।
पिछली बार आपका परिवार कब एकजुट हुआ था?
हर महीने हम एकजुट होते हैं। मेरे सारे रिश्तेदार मुंबई में आस-पास रहते हैं। भले ही हम एक छत के नीचे नहीं रहते लेकिन अलग रहते हैं, पर हर हफ्ते या महीने में एक बार डिनर जरूर साथ में खाते हैं। वो हम हिंदुस्तानियों में हमेशा रहेगा। वो निकल ही नहीं सकता है। परिवार में हमें ये सिखाया जाता है। मैं बैंकॉक  में पांच साल था। मैं वहां यह बहुत मिस करता था। अकेला पड़ गया था। ज्वाइंट फैमिली के अंदर रहकर सिक्योरिटी हो जाती है। मेरी जिंदगी  में इनसिक्योरिटी  नहीं है।
आपके बेटे मिस करते हैं इन चीजों को?
नहीं, उनको सब मिलता है क्योंकि सारे रिलेटिव  साथ रहते हैं। हर रोज सबका आना-जाना लगा  रहता है।
पटियाला हाउस के किरदार में आपको कुछ नया एक्सप्लोर  करने का मौका मिला? कलाकार के तौर पर अपनी सीमाएं तोड़ने का मौका मिला?
मुझे मौका मिला। मुझे नहीं पता कि यह फिल्म कमर्शियली  कितना करेगी? हिट होगी या क्या होगा? पर ये डेफिनेटली  कहूंगा कि इस फिल्म के अंदर मेरे करियर  की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेस  है और ये तभी मुमकिन है जब आप उस किरदार के लिए फील करने लगते  हैं। बहुत सारे कैरेक्टर  मैं करता हूं लेकिन ये सोच कर करता हूं कि ये कैरेक्टर  है, लेकिन ये कैरेक्टर  जो मैंने खेला है उसके लिए मैं खुद को भी मार सकता था। कुछ कैरेक्टर  आप जिंदगी  में पा लेते हैं जिनमें आप खुद को पा लेते हैं तो गट्टू उन कैरेक्टर  में से है। मेरे लिए सब कुछ नया रहा।
हाल-फिलहाल की फिल्मों में हमने आपको स्क्रीन पर निरंकुश और स्वतंत्र देखा। इसमें क्या हम आपको नियंत्रण में देखेंगे?
इसमें मैंने अपने आपको एकदम पकड़ा हुआ है। एक एक्टर के लिए बहुत मुश्किल होता है कि जब कैमरा ऑन  हो तो वह खुद को पकड़ कर रखे। कई बार निखिल आडवाणी को मुझे पकड़ना पड़ा क्योंकि मुझे आदत है कैमरे के सामने आकर खुलने की। मेरे लिए यह मुश्किल रहा। निखिल को थैंक्स कि वे मुझे कंट्रोल कर सके और अनुशासित रख सके।
पटियाला हाउस फिल्म के तौर क्या कुछ नया एक्सप्लोर  करती है? इसमें कुछ नया प्रयोग  किया गया है?
मैं आपको फिल्म का एक और एंगल  बताता हूं। मैं, मेरे पिताजी.फिल्म  के अंदर दिखाया गया है कि मैं लंदन से हूं। पैदाइश लंदन की है, लेकिन हम हैं इंडियन। मुझे क्रिकेट से प्यार है। मैं बड़ा होकर क्रिकेट खेलना चाहता हूं। मुझे खेलने का मौका मिलता भी है इंग्लैंड से। मेरे पिता इस बात के खिलाफ हो जाते हैं। वे कहते हैं कि मैं नहीं चाहता कि तू इंडिया के खिलाफ खेले। मेरा ये कहना है कि पिताजी,  आप स्पोर्ट को स्पोर्ट की तरह लीजिए। मैं वॉर  पर नहीं जा रहा। मैं क्रिकेट खेलने जा रहा हूं। वह एंगल  मैंने सोचा कि यूनिक है क्योंकि क्या हो जाता है कि हम फैन भी..कई देशों में देखा है कि जब दूसरे देश के लोग आते हैं तो लोग बोतलें मार रहे हैं। क्यों? क्योंकि वे दूसरी टीम के लिए खेलने आए हैं। लोग क्यों नहीं महसूस करते कि यह एक खेल है। कोई जंग पर थोड़े ही है। मुझे यह आइडिया पसंद आया। जैसे कि मोंटी  पैनेसर  करके एक सरदार जी, जो इंग्लैंड के लिए क्रिकेट खेलते थे। क्लीयर  कर दूं कि उन पर बेस्ड नहीं है यह फिल्म क्योंकि उनके मां-बाप तो सपोर्ट करते थे कि वे खेलें इंग्लैंड के लिए।
फिल्म का विरोधाभास भी यही है?
हां, क्लैश  बिटवीन  टू जेनरेशन। इस फिल्म के अंदर तीन जेनरेशन है। एक सत्रह-अट्ठारह साल की, एक मेरी जेनरेशन और एक बाबूजी  की जेनरेशन। तीनों जेनरेशन के क्लैश  में मेरी जेनरेशन वाला फंस जाता है क्योंकि नीचे वाली जेनरेशन बोल रही है कि आप हमसे बड़े हैं। आपको बाबूजी  से बोलना चाहिए कि हमें आजादी दें। मेरे में इतनी ताकत नहीं है कि मैं बाबूजी  के खिलाफ जाऊं। तो मुझे न तो ये जेनरेशन लाइक करती है और न बड़ी वाली। फिर क्या होता है और कैसे मेरा किरदार इस स्थिति से बाहर आता है? यह फिल्म में है।
फिल्म में अनुष्का  के किरदार से क्या रिश्ता है आपका?
उनका किरदार है सिमरन  का। वो मेरी मदद करती हैं सही डिसीजन  लेने में। हमारे बीच रोमांस भी है लेकिन जबरदस्ती का रोमांस नहीं है। इस कैरेक्टर  के लिए आपको फील होगा।
निखिल आडवाणी के साथ कैसा अनुभव रहा?
बहुत बढि़या। हमारी पहली फिल्म चांदनी चौक नहीं चली लेकिन उसका यह मतलब नहीं है कि मैं उनके साथ दोबारा काम न करूं। वे हार्ड वर्किग  डायरेक्टर हैं। वे जिस हिसाब से फिल्म को मोड़ देते हैं.. उन्होंने कल हो ना हो बनाई थी। इमोशनल  फिल्म। इमोशन  उनका स्ट्रांग  प्वाइंट है।
आपकी फिल्मों पर नजर डालें तो बहुत सेफ होती हैं। दर्शकों की पसंद का सब कुछ होता है। आप कुछ प्रयोग  करने के बारे में नहीं सोचते?
मैंने प्रयोग  करने की कोशिश की। मैंने तस्वीर की और फिल्में भी कीं, लेकिन यहां की जो आडियंस  है उसे कमर्शियलिटी  देखने में दिलचस्पी है। उन्हें डेढ़-दो सौ रूपए  खर्च करके प्रयोग  नहीं देखना है। जैसे मेरी फिल्म तस्वीर को देखने चार बटा दो लोग नहीं आए थे थिएटर के अंदर। तो उनका एक माइंड सेट है कि हमने दो सौ रूपए खर्च किए तो हमें जाकर एंटरटेन  होना है। हमें गोलमाल देखनी है। हेरा फेरी देखनी है। सिंह इज  किंग  देखनी है। हमें मस्ती वाली फिल्में देखनी हैं। हमें एंज्वॉय  करना है। 3 इडियट  भी मजेदार थी।
बीता साल छोटी फिल्मों का रहा। आज भी उड़ान, तेरे बिन लादेन और फंस गए रे ओबामा  की चर्चा हो रही। आपका मन वैसी फिल्में करने का नहीं होता?
आपकी बात बराबर है लेकिन आप ध्यान से देखें तो वे तीन करोड़ की फिल्में हैं और बारह-तेरह करोड़ का बिजनेस किया है। ये बहुत अच्छा  प्वाइंट है लेकिन आपको ये भी सोचना चाहिए कि जब बड़ी फिल्म होती है तो उसकी कमर्शियलिटी  बड़ी होती है।
उस बजट में आप फिट नहीं होते?
नहीं, नहीं कर पाएंगे ना क्योंकि अगर  मैं करने का जाऊंगा तो डिस्ट्रीब्यूटर  का पैसा ही नहीं निकलेगा। आज कोई भी फिल्म आप बना लें, किसी के साथ भी चाहे सलमान के साथ, मेरे साथ, शाहरूख के साथ, आपको बड़ा बजट रखना पड़ेगा और कमर्शियलिटी  होनी चाहिए। हम बात कर जरूर लेते हैं कि हमने बड़ी अलग किस्म की फिल्म की है लेकिन.।
कुछ एक्टर उस तरह की फिल्में चर्चा और एक्टर के तौर पर खुद को स्थापित करने के लिए करते हैं। आपके मन में ऐसी इच्छा  नहीं होती है?
वो मतलबी हो जाते हैं। अगर  मैं कर भी तो लूं फायदा मेरा होगा कि क्या एक्टिंग  है.अलग तरह की फिल्म की है। पर वहां वह डिस्ट्रीब्यूटर  बोलता है कि साला मार डाला। मैं बर्बाद हो गया.फंस गया। वो आवाज किसी को सुनाई नहीं देती। आज मेरी फिल्म जब कोई खरीदता है तो जैसे आपने कहा कि सेफ रहती हैं। डिस्ट्रीब्यूटर  को पता है कि इतने में खरीदी है तो इतना आ जाएगा। मुझे हर एंगल  से सोचना पड़ता है। कमर्शियल  एंगल से सोचना पड़ता है कि क्या यह सही बैठेगी या नहीं। अवॉर्ड  तो मैं ले लूंगा लेकिन बाकी चीजें गड़बड़ हो जाती हैं।
उस फिल्म का असर भविष्य पर पड़ेगा?
नहीं, मुझे भविष्य की प्रॉब्लम  नहीं है। मैं अपने डिस्ट्रीब्यूटर,  एक्जीबिटर,  ऑडियंस  को निराश नहीं करना चाहता। उड़ान, तेरे बिन लादेन, फंस गए रे ओबामा  मैंने देखी हैं। वे अच्छी  बनी हैं लेकिन उनके नीश  ऑडियंस  है। वे मल्टीप्लेक्स  में रहती हैं। उसके बाद रूक  जाती हैं। फोर्स नहीं आता है। मैं इन फिल्मों का बड़ा फैन हूं लेकिन दबंग  का बिजनेस एक सौ साठ करोड़ रूपए,  गोलमाल का बिजनेस एक सौ चालीस करोड़ का, तीस मार खान का 82  करोड़ का है। फीगर देखना पड़ता है। बहुत चीजें देखनी पड़ती हैं। इंटेलेक्चुअली  आप और मैं बैठकर बात कर लें कि बहुत अच्छी  है, लेकिन उसके बाद क्या? 3  इडियट  जैसी फिल्म बहुत कम आती है। जिसमें मैसेज, एंटरटेनमेंट,  फन और रोमांस होता है। बहुत कम ऐसी स्क्रिप्ट मिलती हैं।
आप प्रोड्यूसर हैं। आप वैसी टीम बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजकुमार हिरानी  के साथ टीम क्यों नहीं बनाते?
मैं बचपन से कमर्शियल  फिल्म देखता रहा हूं। बहुत कम होता है 3  इडियट  जैसी फिल्म मिलना। रोज स्क्रिप्ट आती हैं लेकिन वैसी स्क्रिप्ट नहीं आती। राजू ने दो साल मेहनत करके स्क्रिप्ट पर काम किया। हर आदमी राजू हिरानी  तो नहीं बन सकता। हर आदमी जब फिल्म बनाने बैठता है तो.मैं भी जब बनाने बैठता हूं तो यही सोचकर बनाता हूं.पहले दिन शूटिंग  पर सोच लेता है कि ये शोले बनेगी। हर आदमी यही सोचता है। उसके हिसाब से वह शोले बनाता है। सुपरहिट  है। बाद की बात होती है कि क्या निकलता है।
फिल्म मेकिंग  की बात हो रही है तो आपका फिल्म का लंबा अनुभव है। आप उसका इस्तेमाल फिल्म निर्देशन में नहीं करना चाहते?
नहीं, मैं डायरेक्शन  नहीं करूंगा। जिसका काम उसी को साधे। हमें आदत है कैमरा के सामने रहने की तो आगे आने की क्या जरूरत है।
आपने कहा कि तीस मार खां ने 82  का बिजनेस किया, लेकिन एक अवॉर्ड  फंक्शन  में आप इसी फिल्म का शोक मनाते दिखे। क्यों?
देखिए, बहुत सारे अवॉर्ड  नाइट होते हैं। लोग दूसरे लोगों का मजाक उड़ाते हैं। दूसरे की फिल्मों का मजाक उड़ाते हैं। मेरे अंदर वह हिम्मत है कि मैं अपनी फिल्म का मजाक उड़ा सकूं क्योंकि यह मेरा मजाक है। जैसे आपके मां-बाप को चोट आए तो आपको बहुत बुरा लगेगा  या कोई मां-बाप को चोट पहुंचाए तो बुरा लगेगा।  आपके सामने कोई चाकू लेकर आ जाए तो आप यही कहेंगे कि मेरे मां-बाप को छोड़ दो मुझे मार दो या आप ऐसा कहेंगे कि मां-बाप को पहले मार दो। तो मेरी इंडस्ट्री है, मेरी फिल्म है। अगर  मैं खड़ा होकर यह बोलता हूं कि मेरी फिल्म चली है तो मेरे अंदर खड़े होकर यह बोलने का दम भी होना चाहिए कि मेरी फिल्म नहीं चली है। उसमें बुरा मानने वाली बात नहीं है।
इंडस्ट्री में तीस मार खां को लेकर जैसी बातें हो रही थीं उससे आपको दुख हुआ?
मुझे कोई दुख नहीं हुआ। आपको लगता  है कि मुझे किसी बात का दुख है।
2011  में क्या व्यस्तताएं  होंगी?
लोगों को एंटरटेन  करेंगे। पटियाला हाउस के बाद थैंक्य ू है। उसके बाद देसी ब्वॉयज।
टीवी पर देखेंगे? क्या आप खतरों के खिलाड़ी खिलाड़ी में लौटेंगे?
अभी तक कुछ तय नहीं है। देखते हैं कि क्या होता है।

-रघुवेन्द्र सिंह