Thursday, March 17, 2011

एकता ने मेरे लिए कुछ नहीं किया


तुषार कपूर को नहीं पसद कि उनकी मेहनत का श्रेय कोई और ले जाए, फिर चाहे वह बहन एकता कपूर ही क्यों न हो। अभिनय में दस साल पूरा कर रहे तुषार कपूर ने एक विशेष मुलाकात में साफ शब्दों में कहा, 'एकता ने कभी मेरे लिए कुछ नहीं किया। मेरी पहली फिल्म 'मुझे कुछ कहना है' बालाजी के बैनर की नहीं थी। मैंने बाइस फिल्में की हैं, जिसमें तीन या चार बालाजी की हैं। शोर इन द सिटी' और 'द डर्टी पिक्चर' मेरी आने वाली फिल्में हैं।' अभिनय में अब तक का सफर मैंने अपनी मेहनत से तय किया है। अब मैं अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू करने जा रहा हूं। मैं एकता के साथ फिल्म नहीं बनाऊंगा। मैं पार्टनर ढूंढ रहा हूं।'
तुषार आगे कहते हैं 'लोगों में यह इंप्रेशन है कि एकता मुझे सपोर्ट कर रही हैं। दूसरे एक्टर अपने फादर के साथ फिल्म करते हैं। कुछ लोग अपने चाचा और मामा की कंपनी की फिल्में करके नाम कमाते हैं। उनके बारे में कोई कुछ नहीं कहता। मैंने बाहर की फिल्मों में काम करके अपना नाम बनाया। 'क्या कूल हैं हम' फिल्म में काम करने से कई अभिनेताओं ने इंकार कर दिया था। मुझसे कहा गया कि तू घर का है, कर ले। फिर मैंने उस फिल्म के लिए हा कहा। उस वक्त बालाजी को मैं सपोर्ट कर रहा था। सगीत सिवन ने मुझसे गुजारिश की। डिनो, आफताब, सोहेल खान ने 'क्या कूल हैं हम' में काम करने से मना कर दिया था। ये बात किसी को पता है नहीं।'
तुषार ने कॅरियर से जुड़े फैसले लेने अब खुद शुरू कर दिए हैं। तुषार ने बताया, आरंभ में मेरे कॅरियर के डिसीजन डैड ने लिए थे, जोकि गलत साबित हुए। अब मैं अपने फैसले खुद लेता हूं।'
तुषार अपनी गुड ब्वॉय की छवि से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'पर्सनल लाइफ में आपको जाने बगैर लोग आपकी इमेज बना देते हैं। मुझे भी गुस्सा आता है, मैं भी आपा खोता हूं। मैं निजी जीवन में जैसा हूं, पता नहीं वैसी इमेज क्यों नहीं बन पा रही है। शायद कॅरियर की शुरुआत में पीआर एक्सरसाइज न होने के कारण ऐसा हुआ। मैं मीडिया के सामने खुलकर नहीं आया, उस वजह से यह हुआ। मुझे यकीन है कि आने वाली फिल्म 'शोर इन द सिटी' और 'द डर्टी पिक्चर' से मेरी इमेज बदलेगी।'
-रघुवेन्द्र सिह

Tuesday, March 15, 2011

बस यादों में ही बचा है मैजेस्टिक सिनेमा


मुंबई, १५ मार्च.  हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फिल्म आलम आरा का प्रिंट ही नहीं गायब हुआ है बल्कि इस फिल्म के प्रदर्शन का साक्षी रहे मैजेस्टिक सिनेमा का भी नामो-निशां  मिट चुका है। दक्षिण मुंबई में गिरगांव  में स्थित मैजेस्टिक  सिनेमा के स्थान पर अब बहुमंजिला मैजेस्टिक  शॉपिंग  सेंटर खड़ा हो चुका है।

चौदह मार्च, 1931  को मैजेस्टिक  सिनेमा में प्रदर्शित हुई आलम आरा फिल्म के अस्सी वर्ष पूरे होने पर अखबार, न्यूज चैनल एवं पत्र-पत्रिकाओं में जश्न मनाया जा रहा है, लेकिन मैजेस्टिक  सिनेमा की जमीं पर खड़ी व्यावसायिक इमारत में लोग आलम-आरा के प्रदर्शन के अस्सी साल के जश्न से अंजान हैं। डायमंड व्यापारी रोज की तरह लेन-देन और ग्राहकों के इंतजार में बैठे हैं। दिलचस्प बात यह है कि गिरगांव  की नई पीढ़ी इस बात से भी अंजान है कि उनके इलाके में मैजेस्टिक  सिनेमा हुआ करता था। मैजेस्टिक  शॉपिंग  सेंटर में ग्राउंड फ्लोर पर चौबीस वर्षो से ट्रवेल  एजेंसी चला रहे प्रकाश दलवी  बताते हैं, बचपन में हम परिवार के साथ मैजेस्टिक  सिनेमा में फिल्में देखने आते थे। मराठी फिल्में ज्यादा चलती थीं, लेकिन टॉवर  कल्चर ने मैजेस्टिक  सिनेमा को कुचल दिया। अब तो हमारी यादों में ही मैजेस्टिक  सिनेमा है।
गौरतलब है कि मैजेस्टिक  शॉपिंग  सेंटर के मालिक गोवाली बिल्डर्स हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि गोवाली बिल्डर्स ने जब मैजेस्टिक  सिनेमा के स्थान पर शॉपिंग  सेंटर बनाना शुरू किया तो शिवसेना के नेता प्रमोद नवलकर  ने उनका विरोध किया। शिवसेना की मांग पर गोवाली बिल्डर्स ने मैजेस्टिक  थिएटर के लिए स्थान छोड़ा था, लेकिन बाद में पार्किग  स्पेस  की कमी के कारण थिएटर बनाने का विचार छोड़ना पड़ा। मैजेस्टिक  शॉपिंग सेंटर के सामने स्थित मैजेस्टिक  सिनेमा बस स्टॉप  के जरिए ही पता चलता है कि यहां मैजेस्टिक  सिनेमा हॉल  हुआ करता था। अब बस स्टॉप  में ही मैजेस्टिक  सिनेमा का इतिहास शेष है।
चौदह मार्च 1931  में हंड्रेड  परसेंट टॉकी  का दावा करती फिल्म आलम आरा का प्रदर्शन मैजेस्टिक सिनेमा में हुआ था। अर्देशिर  ईरानी निर्देशित आलम-आरा का जादू देखने भारी भीड़ इस थिएटर के बाहर उमड़ी थी। प्रतिदिन आलम आरा के तीन शो साढ़े शाम पांच बजे, आठ बजे और दस बजे चलाया जाता था। शनिवार, रविवार और बैंक की छुट्टियों के दिन तीन बजे का स्पेशल शो चलाया जाता था। स्कूल और कॉलेज  के लड़के-लड़कियों के लिए रविवार को सुबह दस बजे एक स्पेशल शो रखा गया था। अखबार में आलम-आरा का विज्ञापन प्रकाशित होने के बाद कुछ सप्ताह के टिकट बिक गए थे और हिंदी सिनेमा की इस पहली बोलती फिल्म ने सफलता का कीर्तिमान रच दिया, पर अफसोस की बात यह है कि आज न तो आलम आरा के प्रिंट उपलब्ध हैं और न ही फिल्म के प्रदर्शन का साक्षी बना मैजेस्टिक  सिनेमा हॉल। 
-रघुवेन्द्र सिंह 

शोले संग छोले ने बनाया हीरो


रणवीर सिंह को फिल्म इन्डस्ट्री  और आवाम ने स्वीकार कर लिया है. उन्हें साल के सभी फिल्म समरोहों में बेस्ट मेल डेब्यु और स्टार आफ टुमारो के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. आत्म विश्वास से लबरेज, खुशमिजाज और बातुनी युवा अभिनेता रणवीर सिंह से बातचीत-

जिस स्टार रणवीर को आज दुनिया देख रही है, उन्हें तैयार होने में कितना समय लगा?
पहले तो मैं कहना चाहुंगा कि मैं स्टार तो हूँ नही. मैं एक्टर हूँ. मेरा लक्ष्य लोगों का मनोरंजन करना है. रणवीर हमेशा से ऐसा ही था. लोग उसकी तरफ देखते नही थे. 
बैंड बाजा बारात की कामयाबी के बाद व्यक्तित्व और सोच में क्या बदलाव आया है?
अब इतना काम हो गया है कि फुरसत नहीं मिलती। सोता कम हूं, सोचता ज्यादा हूं। फैमिली और दोस्तों के लिए वक्त कम निकाल पाता हूं।
हिंदी सिनेमा से पहला परिचय कब हुआ? पहली फिल्म कौन सी याद है?
शोले. यह फिल्म मैंने बचपन में कई बार देखी। मैं दादी के घर जाता था। उनके पास वीसीआर और सिर्फ शोले का कैसेट था। दादी छोले-ब्रेड बनाती और मैं खाते हुए शोले देखता था। मैं तब केजी में था और हर दो दिन में इसे जाकर देखता था। कह सकते हैं कि शोले मेरी पहली फिल्म क्लास थी।
कब लगा कि एक्टिंग के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते?
मैं इंडियाना यूनिवर्सिटी में एडवरटाइजिंग की पढ़ाई करने गया था। वहां सारी क्लास फुल थी। मैं एक्टिंग की क्लास में घुस गया। प्रोफेसर ने क्लास में आते ही कहा कि सब लोग बारी-बारी से परफॉर्म करके दिखाओ। मैं खड़ा हुआ और दीवार फिल्म का डायलॉग बोलने लगा, 'उफ्फ तुम्हारे उसूल, तुम्हारे आदर्श.।' मैंने हिंदी में डायलॉग बोला तो किसी को समझ में नहीं आया, लेकिन सबको लगा कि मैंने जोश के साथ परफॉर्म किया। उस क्लास में मैंने खुद से कहा कि रणवीर अब एक्टिंग में घुस जाओ, जो होगा देखा जाएगा।
कितना लंबा संघर्ष रहा?
साढ़े तीन साल। मैं ब्लूमिंगटन से डिग्री लेकर लौटा तो पता नहीं था कि ब्रेक कैसे मिलेगा। थिएटर में एक्टिंग सीखने की कोशिश की, पर वहां देखा कि तीन साल गधा मजदूरी करने के बाद सामने आने का मौका मिलता है। मैं एक्टिंग क्लास में गया, लेकिन वहां जो एक्टिंग सिखाई जा रही थी वह 1980 में आउटडेटेड हो गई थी। मैं शाद अली का असिस्टेंट डायरेक्टर बन गया। सोच लिया था कि छोटे रोल नहीं करूंगा। छब्बीस की उम्र तक रूकूंगा। चौबीस की उम्र में मुझे यशराज से लीड रोल करने के लिए फोन आ गया।
यशराज बैनर की नई फिल्म 'लेडीज वर्सेज रिकी बहल' में किस अंदाज में दिखेंगे?
रिकी बहल एक कॉन आर्टिस्ट है। वह लड़कियों को चकमा देकर उनके पैसे लेकर भाग जाता है। खुश हूं कि बैंड बाजा बारात की टीम इसमें भी है। अनुष्का हैं, मनीष शर्मा हैं। इस बार हम बैंड बाजा बारात से अलग ट्राय कर रहे हैं।
उम्मीद थी कि बिंट्टू इस कदर लोगों को पसंद आएगा?
मैं उम्मीद नहीं कर रहा था। बिंट्टू जमीन से जुड़ा था। वह कूल नहीं था। मैं चौंक गया जब लड़कियां मुझे अट्रैक्टिव पाने लगीं। मैं एक अवॉर्ड फंक्शन के लिए सिंगापुर गया। वहां लड़कियों ने मुझ पर अटैक कर दिया। मेरे कपड़े फाड़ दिए। चुटकियां काट रही थीं। बस, किसी तरह मेरी इज्जत बच गई!
-रघुवेंद्र सिंह   

क्या प्रीति तोड़ेंगी रिकार्ड


कलर्स के शो 'गिनीज व‌र्ल्ड रिकॉ‌र्ड्स-अब इंडिया तोड़ेगा' में बतौर एंकर दर्शकों से रूबरू होने जा रही प्रीति जिंटा के स्टारडम की अब परीक्षा की घड़ी है। क्या वह दूसरे स्टार कलाकारों को टीआरपी के खेल में पछाड़ पाएंगी?
प्रीति जिंटा ने तय कर रखा था कि वह टीवी पर किसी डास या सिगिग रिएलिटी शो से डेब्यू नहीं करेंगी। प्रीति के अनुसार, 'मेरे पास टीवी शो के ऑफर आ रहे थे, लेकिन मैं पैसे के लिए शो नहीं करना चाहती थी। मैं डास शो में जज बनने के लिए तैयार नहीं हुई, क्योंकि मैं दुनिया की बेस्ट डासर नहीं हूं। 'गिनीज व‌र्ल्ड रिकॉर्ड्स' शो का कासेप्ट मुझे हटकर लगा। इसकी खासियत है कि इसमें मुझे इंडिया को करीब से देखने का मौका मिल रहा था। दुनिया में एक ही व‌र्ल्ड रिकॉर्ड होता है। जब उसे कोई तोड़ता है, तो उसमें नयापन होता है। गिनीज व‌र्ल्ड रिकॉर्ड्स में इंडिया चौथे स्थान पर है। इस शो में हम कोशिश करेंगे कि इंडिया एक-दो पायदान ऊपर आए।'
प्रीति जिंटा पिछले दो साल आईपीएल में व्यस्त रहीं। इस दौरान न तो उन्होंने अपने लुक पर ध्यान दिया और न ही खान-पान पर। प्रीति बताती हैं, 'मैं भूल गई थी कि कैमरे के सामने आने के लिए कितनी तैयारी करनी पड़ती है। मैं जींस-टीशर्ट पहनकर बिना मेकअप के घूमती थी। पिछले साल के अंत में मैंने तय किया कि एंटरटेनमेंट व‌र्ल्ड में वापसी करनी है। मैं जिम गई तो इंस्ट्रक्टर ने बोला कि साढ़े सात किग्रा वजन बढ़ गया है। मैं तबसे वर्कआउट कर रही हूं। अब मैं फिट हूं।'
आईपीएल ने प्रीति जिंटा को और मेच्योर बना दिया। प्रीति कहती हैं, 'आप एक्टर होते हैं, तो सिर्फ अपनी चिता होती है। प्रोड्यूसर के बारे में आप नहीं सोचते। क्रिकेट आईपीएल से जुड़ने पर मेरे सामने बजट, प्लेयर और अगर वेन्यू के पास झगड़ा हो रहा है तो कैसे वह खेल को इफेक्ट करेगा, इतनी सारी चीजें फिक्र करने के लिए थी। अब मुझे अच्छा लग रहा है। लोग मेरा ख्याल रख रहे हैं।'
प्रीति आश्वासन देती हैं कि शो में दर्शक उनके निजी व्यक्तित्व से परिचित होंगे। प्रीति कहती हैं, 'मैं बनावटी अंदाज में शो की एंकरिंग नहीं कर सकती। आप रियल होंगे तभी नई और मजेदार चीज निकलकर आएगी। इस शो में मुझे हिंदी में बोलना है। यह थोड़ा मुश्किल है। सिपल सेंटेंस हिंदी में बोल सकते हैं, लेकिन आत्मसम्मान जैसे शब्द मुश्किल होते हैं। वैसे इंग्लिश का ट्रासलेशन हिंदी में मैं ही करती हूं।'
शो ने प्रीति जिंटा की देश के बारे में सोच बदल दी है। प्रीति कहती हैं, 'पिछले तीन-चार महीनों में जो घोटाले हुए, उसकी वजह से मैं डाउन फील कर रही थी। इस शो में आने पर मैं ऐसे लोगों से मिली, जो देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। वे मेरे लिए हीरो हैं। ऐसी चीजें प्रेरणा देती हैं। इन चीजों को मैं अपनी परफॉर्मेस में एड करूंगी।' अपने कलाकार मित्रों से तुलना या कापिटिशन की बात को नजरअंदाज कर प्रीति सबकी तारीफ करते हुए कहती हैं, 'मुझे शाहरुख, सलमान, मिस्टर बच्चन और माधुरी टीवी पर अच्छे लगे।' यह कहते हुए प्रीति बात समाप्त करती हैं कि इस साल वह बड़े पर्दे पर दिखेंगी।
-रघुवेन्द्र सिह

अंधेरा ने बदली मेरी सोच-अनीता हसनदानी


लंबे समय के बाद अनीता हसनदानी विक्रम भट्ट के हॉरर शो 'अनहोनियों का अंधेरा' के जरिए एक बार फिर दर्शकों के बीच हैं। अनीता कहती हैं, 'मैं काफी समय से अलग तरीके के प्रोजेक्ट का इंतजार कर रही थी। सास-बहू टाइप सीरियल मैं नहीं करना चाहती थी, इसीलिए सीरियल से ब्रेक लिया था।'
इस ब्रेक के दौरान अनीता ने साउथ की कुछ फिल्में कीं। उन्होंने डास और कुकिंग सीखी। अनीता बताती हैं, 'मैंने फैमिली और फ्रेंड्स के साथ समय बिताया। जब मैं डेली सोप करती थी, तो इनके लिए मेरे पास समय नहीं होता था। 'अंधेरा' में अपनी भूमिका के बारे में अनीता बताती हैं, मैं अनाहिता का किरदार निभा रही हूं। वह आत्माओं को देख सकती है। उनसे बात कर सकती है। साथ ही वह फैमिली ओरिएंटेड भी है। यह मेरे लिए चैलेंजिंग किरदार है। पहले मैं सुपरनैचुरल पॉवर में यकीन नहीं करती थीं, लेकिन इस शो में काम करने के बाद मेरी सोच बदल गई है।'
'फिलहाल मैंने तय किया है कि एक समय पर एक ही सीरियल करूंगी, पर कोई कमाल की फिल्म का ऑफर आया, तो फिर से फिल्म में काम करना चाहूंगी।
-रघुवेंद्र सिंह 

एकता का हॉरर एमएमएस

बीते बरस एकता कपूर ने लव सेक्स और धोखा फिल्म के रूप में बड़े पर्दे पर साहसिक प्रयोग किया। परिणाम सुखद मिलने के बाद अब उन्होंने अपने नव स्थापित बैनर अल्ट एंटरटेनमेंट के तहत रागिनी एमएमएस फिल्म बनाई है।

एकता के अनुसार, ''एमएमएस सुनकर लोगों को लगता है कि रागिनी एमएमएस सेक्स फिल्म होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक कपल की कहानी है, जो बंगले में वीकेंड स्पेंड करने जाता है। लड़का सोचता है लड़की का एमएमएस बनाकर बेच दूंगा। वह कमरे में कैमरा लगा देता है, लेकिन उसे पता नहीं होता कि उस घर में एक और चीज है।''
रागिनी एमएमएस का निर्देशन नए निर्देशक पवन कृपलानी ने किया है। लव सेक्स और धोखा फिल्म से चर्चा में आए राजकुमार यादव ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई है और उनके अपोजिट कैनाज मोतीवाला हैं। इस फिल्म को एकता पारिवारिक नहीं, बल्कि सुपरनैचुरल थ्रिलर फिल्म बताती हैं। वह कहती हैं, ''अल्ट एंटरटेनमेंट में हम अलग किस्म की फिल्में बनाते हैं। पारिवारिक फिल्मों और टीवी सीरियल का निर्माण बालाजी के बैनर में होता है। ऐसी हॉरर फिल्म आप बच्चों को नहीं दिखा सकते। आज तक जो हॉरर फिल्में दर्शकों ने देखी हैं, उसमें टिपिकल भूत होते हैं। इसमें ऐसा नहीं होगा। डर क्या होता है? यह इस फिल्म में पता चलेगा।''
-रघुवेन्द्र सिंह

चली ब्रांड की हवा चली


कभी कलात्मक अभिव्यक्ति कहा जाने वाला सिनेमा अब वैश्वीकरण के प्रभाव में उत्पाद बन गया है। बाजार में विशिष्ट पहचान के लिए निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों को ब्रांड के रूप में स्थापित करने में लग गए हैं। फिल्मों की मार्केटिंग भी इस अंदाज में की जा रही है कि वे ब्रांड बन जाएं और उसे भविष्य में भुनाया जा सके।

हॉलीवुड की परंपरा
फिल्मों को ब्रांड के रूप में पेश करने की परंपरा का वाहक रहा है हॉलीवुड। जेम्स बांड, रॉकी, हैरी पॉटर, लॉर्ड ऑफ रिंग्स, जुरासिक पार्क, द ममी, श्रेक; यह सभी हॉलीवुड के लोकप्रिय 'ब्रांड' हैं। ब्रांड वैल्यू का ही असर है कि इन फिल्मों के नाममात्र से ही कथ्य, विधा और चरित्र का आभास हो जाता है। इनकी ब्रांड वैल्यू को भुनाने के लिए उसी नाम की दूसरी फिल्में बनायी जाती हैं जिनकी कहानी अलग होती है, पर मुख्य चरित्र और मूल ढांचा वही होता है। निर्देशक साजिद खान कहते हैं, ''जेम्स बांड की कोई भी फिल्म आती है तो दर्शक उसे देखने जरूर जाते हैं। जेम्स बांड चालीस साल से हॉलीवुड का ब्रांड है। उसी तरह हैरी पॉटर भी है। इनसे निर्माता भी संतुष्ट रहते हैं और दर्शक भी अपनी पसंदीदा ब्रांड की फिल्में देखकर खुश हो जाते हैं।''
हिट है मुन्नाभाई!
हॉलीवुड की तर्ज पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी फिल्मों को ब्रांड के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है। दर्शकों की स्वीकार्यता के कारण पिछले दशक में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मुन्नाभाई, धूम, कृष जैसे ब्रांड स्थापित हो गए हैं। इसका पहला प्रयास नगीना की सफलता के बाद हुआ था। नगीना की सफलता को निगाहें में भुनाने का प्रयास किया गया था, पर वह सफल नहीं हो पाया। फिल्म विशेषज्ञ तरण आदर्श कहते हैं, ''मुन्नाभाई एमबीबीएस की सफलता और लोकप्रियता के बाद हिंदी फिल्मों में ब्रांड की प्रथा चल पड़ी। मुन्नाभाई के कैरेक्टर के प्रति दर्शकों के लगाव के मद्देनजर निर्माता विधु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजू हिरानी ने लगे रहो मुन्नाभाई का निर्माण किया। दर्शक सिनेमाघर में लगे रहो मुन्नाभाई देखने ही इसलिए गए क्योंकि उस फिल्म के साथ मुन्नाभाई नाम जुड़ा हुआ था। यशराज बैनर की धूम से यह सिलसिला आगे बढ़ा जो कोई मिल गया से कृष और गोलमाल से गोलमाल 3 तक जारी है।''
चौतरफा है फायदा
फिल्मों के ब्रांड बनने के बाद निर्माता-निर्देशक से लेकर अभिनेता-अभिनेत्री तक सभी के हाथ घी में होते हैं। फिल्म बाजार को भी चौतरफा फायदा होता है। ब्रांड की लोकप्रियता का यह आलम है कि मुन्नाभाई सिरीज की फिल्म हो या गोलमाल या धूम, शीर्ष के अभिनेता-अभिनेत्री इनका हिस्सा बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं। करीना कपूर ने अपने स्टार स्टेटस का फायदा लेकर कुणाल खेमू को गोलमाल 3 में एंट्री दिलायी जिससे कुणाल के कॅरिअर की गाड़ी एक बार फिर से दौड़ने लगी। इसी तरह धूम 3 की हीरोइन बनने के लिए प्रियंका चोपड़ा, प्रीति जिंटा, कट्रीना कैफ और दीपिका पादुकोण जुगत लगा रही हैं। आमिर खान जो खुद ब्रांड माने जाते हैं, अब धूम ब्रांड का हिस्सा बनकर उत्साहित हैं। आमिर कहते हैं, ''जब भी मैं धूम की सिग्नेचर ट्यून सुनता हूं मेरे कदम थिरकने लगते हैं। धूम ब्रांड के लोकप्रिय किरदार जय और अली के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर करने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं।'' गोलमाल श्रंखला की फिल्मों से सफलता का स्वाद चख रहे तुषार कपूर कहते हैं, ''जब गोलमाल जैसा ब्रांड आपके पास होता है तो आप दूसरे किस्म की फिल्मों में रिस्क ले सकते हैं। यदि उनमें सफलता नहीं मिलती है तो आपको पता है कि आपके पास एक सुरक्षित विकल्प मौजूद है।''
कैश हो रहीं क्लासिक
बाजारवाद के प्रभाव में शुरू हुए ब्रांड के ट्रेंड में अब निर्माता-निर्देशक क्लासिक फिल्मों की सदाबहार लोकप्रियता को भुनाना शुरू कर चुके हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत सफल फिल्म डॉन का रीमेक बना रहे फरहान अख्तर को भी नहीं पता था कि यह ब्रांड बन जाएगी। इन दिनों वे शाहरूख खान अभिनीत डॉन की ब्रांड वैल्यू को डॉन 2 के निर्माण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत क्लासिक फिल्म अग्निपथ की लोकप्रियता भुनाने की तैयारी में हैं करण जौहर। वे रितिक रोशन को लेकर अग्निपथ 2 का निर्माण कर रहे हैं। गौरतलब है कि इसी कड़ी में मिस्टर इंडिया 2 के निर्माण की योजना है।
उज्जावल है भविष्य
मुन्नाभाई, धूम और गोलमाल सिरीज की फिल्मों की सफलता से प्रेरित होकर अब बाजार में नए ब्रांड स्थापित करने की पहल शुरू हो गयी है। पिछले वर्ष प्रदर्शित हुई सफल फिल्म हाउसफुल को ब्रांड का रूप देने में जुट चुके साजिद खान कहते हैं, ''हॉलीवुड में जो चीज होती है, वह अब यहां भी होने लगी है। अगर फिल्म ब्रांड बन जाती है, तो यह बहुत अच्छी बात है। मैं हाउसफुल को ब्रांड बना रहा हूं।'' हाउसफुल 2 की ही तरह पार्टनर 2, दबंग 2, दोस्ताना 2, रेस 2, नो एंट्री 2, यमला पगला दीवाना 2 को भी ब्रांड बनाने का प्रयास प्रारंभ हो चुका है। फिल्म बाजार पर पैनी नजर रखने वाले तरण आदर्श कहते हैं, ''अभी तो यह शुरूआत है। भविष्य में ब्रांड का ट्रेंड और बढ़ेगा!''
-रघुवेन्द्र/सौम्या