Friday, February 11, 2011

क्या आजमगढ़ शहर की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान वापस लौटेगी?

महानुभाव-कहाँ से हैं आप?


-मैं आजमगढ़.से हूँ.

महानुभाव-ओह, आप अबू सलेम के शहर से हैं! आप बड़े खतरनाक शहर से हैं.

-शायद आपको पता नहीं कि राहुल सांकृत्यायन, कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी भी आजमगढ़ से हैं.

महानुभाव-अच्छा! हाँ...
क्या आजमगढ़ शहर की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान वापस लौटेगी?





Wednesday, February 9, 2011

मेरी पहचान आजमगढ़ से है-शबाना आज़मी

सशक्त अभिनेत्री एवं समाजसेवी शबाना आजमी आजमगढ़ में अपने पिता कैफी आजमी द्वारा स्थापित मिजवां वेलफेयर सोसायटी की सेवाओं को विस्तार देना चाहती हैं। वह मिजवां के साथ आजमगढ़ के दूसरे गांवों में चिकनकारी एवं सिलाई-कढ़ाई सेंटर खोलना चाहती हैं। जुहू में अपने निवास स्थान पर शबाना आजमी ने विशेष बातचीत में कहा कि हमें विदेश से चिकनकारी और क्रोशे के बहुत ऑर्डर मिल रहे हैं। हमें ज्यादा लोगों की जरूरत है। अब हम मिजवां में सीमित नहीं रह सकते। सरायमीर हो या फूलपुर या फिर आजमगढ़ के दूसरे गांव, हम दूसरे सेंटर से जुड़ेंगे। हम महिलाओं को प्रशिक्षण देंगे और रोजगार भी। मिजवां वेलफेयर सोसायटी के जरिए शबाना आजमी आजमगढ़ के मिजवां (पैतृक स्थान) में आठ वर्षो से अपने पिता के सपने को साकार करते हुए लड़कियों एवं महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम कर रही हैं। पिछले दिनों मुंबई में मिजवां वेलफेयर सोसायटी के मिजवां सोनेट्स इन फ्रेबिक फैशन शो में शबाना आजमी ने लोकप्रिय युवा अभिनेता रणबीर कपूर को मिजवां वेलफेयर सोसायटी का यूथ फेस घोषित किया। शबाना आजमी ने कहा कि रणबीर कपूर जब लड़कियों को लड़कों के बराबर मौका देने की बात कहेंगे तो दुनिया सुनेगी।
शबाना आज़मी मिजवां वेलफेयर सोसायटी के कार्यों और फिल्म स्टार के सहयोग कि बदौलत आजमगढ़ की छवि सुन्दर बनने के लिए लगातार काम कर रही हैं। शबाना आज़मी ने कहा, फिल्म इंडस्ट्री कि तमाम बड़ी हस्तियों ने आजमगढ़ का नाम लेकर उसे रोशन कर दिया है। आजमगढ़ के माथे पर लगा कलंक एक रात में मिटा दिया। शबाना अपने सामाजिक कार्यों के जरिये आजमगढ़ को नई पहचान दे रही हैं। शबाना ने कहा, आजमगढ़ की नई पहचान बन रही है। १८५७ की क्रांति में आजमगढ़ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लोग उसे भूल रहे हैं। साहित्यिक और सांस्कृतिक तौर पर चाहे वह राहुल सांकृत्यायन, कैफ़ी आज़मी, शिबली नुमानी, सरजू पांडे ने आजमगढ़ को जो शान दी थी, उसे वापस लाना है। आजमगढ़ कि नह पहचान बनने के लिए जो काम कर रहा है, मैं उसके साथ हूँ। शबाना आज़मी ने अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा की हैरत कि बात है कि आजमगढ़ के एमपी एकजुट होकर काम नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरी पहचान आजमगढ़ से है क्योंकि मेरे नाम में आजमी है। मुझे आजमगढ़ पर नाज है। मेरे अब्बा वहां से थे। इस शहर से मेरा भावनात्मक लगाव है।
-रघुवेंद्र सिंह

किस किसको खुश करूं: रानी मुखर्जी

फिल्म नो वन किल्ड जेसिका में अपने रोल के लिए रानी मुखर्जी को आजकल ढेरों बधाई संदेश आ रहे हैं। जिन लोगों ने मान लिया था कि रानी का राज खत्म हो चुका है, अब वे अपनी उस नासमझी के लिए रानी की क्षमता को स्वीकार रहे हैं। रानी भी खुश हैं। इस खुशी में उन्होंने हमें भी शामिल किया।
नो वन किल्ड जेसिका के लिए मिल रही सबसे आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया क्या है?
बहुत सारे लोगों ने आकर कहा कि आप फिल्म में हीरो की तरह हो। वह कमेंट सुनकर मजा आया। उन्हें लगा कि मीरा उस लेवल का कैरेक्टर था कि उसे कोई आदमी भी कर सकता था। वह सरप्राइजिंग लगा। दो-तीन जर्नलिस्ट ने मेरे बारे में लिखना बंद कर दिया था। उन्होंने मुझे फोन करके माफी मांगी और कहा कि हमें थप्पड़ मार दो रानी। हम गलत थे। वे बातें दिल को छू गई। पर्दे पर आपका गालियां देना लोगों को अच्छा नहीं लगा। सुना जा रहा है कि आपके पैरेंट्स भी इस बात से आहत हैं?
जब आप एक किरदार निभा रहे होते हैं तो बहुत कंविक्शन के साथ काम करना पड़ता है। बहुत लोग कह सकते हैं कि मुझे गालियां नहीं देनी चाहिए थीं, पर कुछ लोगों की राय है कि वह सही था। दोनों टाइप के रिएक्शन मुझे मिले हैं। मैं किस किस को खुश करूं यार..? वैसे भी हर बार सबको खुश नहीं किया जा सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि इस बार ज्यादा लोग खुश हुए हैं। उसकी वजह से बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को अच्छा कलेक्शन मिला है।
आपने अब तक जितनी फिल्में कीं, उनमें कितनी अपनी और कितनी दर्शकों की पसंद से कीं? दोनों में सफलता का प्रतिशत क्या रहा?
दोनों का प्रतिशत समान है। बहुत बार ऐसा होता है कि आप सोचते हो कि ऑडियंस को फिल्म पसंद आएगी और वह नहीं आती है। कभी-कभी आप अपनी पसंद से करते हो और वह आडियंस को भी पसंद आती है। जैसे दिल बोले हडि़प्पा, मुझे लगा था कि यह ऑडियंस को बहुत पसंद आएगी। उसमें रोमांस, कॉमेडी, ऐक्शन, डांस, इमोशन, ड्रामा, सॉन्ग, स्पो‌र्ट्स सब कुछ था। एंटरटेनिंग फिल्म थी। लगा कि हर उम्र के लोगों को अच्छी लगेगी, लेकिन यह ज्यादा लोगों को पसंद नहीं आई। जिस तरह से फिल्म चलनी चाहिए थी, नहीं चली। जैसे कि इस बार मैंने नो वन किल्ड जेसिका की। मैंने सोचा कि मुझे पसंद आएगी और दर्शकों को भी। यह ऐसा सब्जेक्ट था जिससे हम सभी रिलेट करते हैं।
फिल्मों में आप लंबे समय से हैं। उसका इस्तेमाल आप दूसरे तरीके से करने के बारे में क्यों नहीं सोचतीं?
आपका मतलब है फिल्म प्रोडक्शन..। यहां अपने अनुभव का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन मैं हर काम समझदारी और समर्पण से करती हूं। मैं किरदार में घुस जाती हूं। यदि मैं प्रोडक्शन में घुसती हूं तो शायद वह मेरे एक्टिंग प्रोफेशन पर भारी पड़ सकता है। अगर आप प्रोडक्शन में आते हैं तो आपके सोचने का नजरिया अलग हो जाता है। उस डायरेक्शन में जाना मुश्किल है। मैंने मेहनत से पैसे कमाए हैं। अगर कोई फिल्म नहीं चलेगी, तो मेरा पैसा डूब जाएगा तो मुझे बहुत दुख होगा।
नए निर्देशकों को अब आप अपने साथ काम करने का मौका दे रही हैं। पुराने प्रतिष्ठित निर्देशकों से दूरी बनाने की क्या वजह है?
हम हर समय स्क्रिप्ट और कैरेक्टर के हिसाब से फिल्म का आकलन करते हैं। जैसे कि एक्सेल एंटरटेनमेंट, जो रीमा कागटी के साथ फिल्म बना रहे हैं, उस पर आमिर, करीना और मुझे भरोसा है। हमने कहानी पर भरोसा करके फिल्म साइन की है। हमें भरोसा है कि रीमा बहुत अच्छा काम करेंगी। मैंने राजकुमार गुप्ता को भी उनकी स्क्रिप्ट और स्क्रीन प्ले के हिसाब से आंका। यशराज फिल्म्स में मैंने अलग-अलग डायरेक्टर के साथ काम किया, क्योंकि यशराज को उन पर भरोसा था। कई बार ऐसा हुआ है कि बड़े डायरेक्टर मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए पर मुझे कैरेक्टर पसंद नहीं आया।
दोस्ती या रिश्ते निभाने के लिए आप फिल्में साइन नहीं करती हैं?
मैंने पीछे दोस्ती के लिए बहुत सारी फिल्में कीं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि आज वह ट्रेंड है। आज दुनिया प्रैक्टिकल हो गई है। तीन साल पहले तक मैंने दोस्ती के लिए फिल्में कीं। सांवरिया मैंने संजय लीला भंसाली के कहने पर की। संजय ने कहा था, मैं आपको मिस कर रहा हूं। मैंने फिल्म में यह रोल डाला है। चार दिन के लिए काम कर लो। मैंने दोस्ती के लिए वह फिल्म कर ली। आज यह सब नहीं चलेगा। ऑडियंस मुझे माफ नहीं करेगी। मैं साल में एक फिल्म करती हूं। उसमें अगर आडियंस को संतुष्ट नहीं करूं, तो वे नाराज हो जाएंगे। बहुत सोच-समझकर फिल्म साइन करनी पड़ती है।
टीवी के लिए काम करेंगी?
धांसू ऑफर आया तो जरूर करूंगी। मैंने देखा है कि टीवी ऐसा माध्यम है कि आडियंस के साथ तुरंत कनेक्शन होता है। हर दिन आपको लोग देख रहे हैं अपने घर में। मेरे खयाल से टीवी करना चाहिए। स्पेशली मुझे, क्योंकि मैं साल में एक फिल्म करती हूं, तो बीच में मेरा कोई टीवी शो आ जाए, जिसके जरिए आडियंस मेरे साथ कनेक्ट रह सकें। यह अच्छा होगा।
-रघुवेंद्र सिंह

मैं पति बन गया: नील नितिन मुकेश



नील नितिन मुकेश की शादी करने की योजना पर पानी फिर गया है, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा है। आजकल वे जोरशोर से जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्म सात खून माफ के बहाने नील से निजी जीवन की योजनाओं के बारे में की बातचीत..
लफंगे परिंदे की रिलीज के बाद आप कहां व्यस्त रहे?
सात खून माफ के सेट पर व्यस्त रहा। अब्बास-मस्तान की फिल्म प्लेयर्स में व्यस्त रहा। बीच में दस दिन का समय मिला, तो परिवार के साथ धार्मिक यात्रा पर निकल गया। मेरा परिवार हर साल धार्मिक यात्रा पर जाता है। फिल्मों की व्यस्तता के कारण मैं तीन साल से उनके साथ नहीं जा पा रहा था। खुश हूं कि इस बार मैं उनके साथ रहा।
आप सात खून माफ से कैसे जुड़े?
मैं कानपुर में अपनी बहन के घर था। विशाल के असिस्टेंट का फोन आया कि वे आपसे मिलना चाहते हैं। मैं उनसे जाकर मिला। उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट सुनाई। फिर पूछा कि क्या तुम खुश हो? मैंने कहा कि जैसी फिल्म और जैसा किरदार आप मुझे दे रहे हैं, वैसा मौका आज के युवा कलाकारों को नहीं मिलेगा। मैं लकी हूं।
सात खून माफ को शुरू से प्रियंका चोपड़ा की फिल्म कहा जा रहा है। हां कहने से पहले आपके मन में कोई भावना नहीं आई?
बिल्कुल नहीं। यह फिल्म सुजैना और उसके सात पतियों की कहानी है। प्रियंका इसमें सुजैना का किरदार निभा रही हैं। सात पतियों में से एक पति बनना मेरे लिए बहुत अच्छा मौका था। बेशक यह फिल्म प्रियंका के किरदार पर आधारित है, लेकिन सात पति नहीं, तो कहानी भी नहीं। मुझे अच्छा लगा कि प्रियंका के साथ काम करने का मौका मिला।
फिल्म में किस तरह के पति का किरदार निभा रहे हैं आप?
मैं मेजर एडविन रॉड्रिक्स का किरदार निभा रहा हूं। एडविन हैंडसम है, सख्त और अनुशासित है। वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है। यह किरदार मेरे लिए बहुत चैलेंजिंग था। इतनी कम उम्र में मेरे लिए मेजर से आईडेंटिफाई करना मुश्किल था। मेरे लिए इस किरदार की कल्पना करना नामुमकिन था। दिल्ली में मेरे एक अंकल हैं। वे आर्मी में हैं। इस किरदार की तैयारी में मैंने उनसे मदद ली। एडविन का लुक चाचा से मिलता है।
निजी जीवन में भी आप पति बनने की तैयारी कर रहे थे। क्या हुआ?
मैंने सोचा था कि तीस साल की उम्र तक शादी कर लूंगा। मैंने सोलह साल की उम्र में अपने लिए जो योजनाएं बनाई थीं, सारी पूरी हुई। सिर्फ शादी की योजना फेल हो गई। शादी में अड़चन आ गई। उनतीस का हो गया हूं, चिंता हो रही है। अगर कोई जल्दी से मिल जाए, तो शादी कर लूंगा।
विशाल भारद्वाज के निर्देशन में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
पता ही नहीं चला कि फिल्म कब बन गई? वे शांत मिजाज के हैं। उन्हें देखकर यकीन नहीं होता कि वे इतनी खतरनाक फिल्में बनाते हैं।
आप और किन प्रोजेक्ट्स में व्यस्त रहेंगे?
प्लेयर्स के लिए न्यूजीलैंड जा रहा हूं। इसकी शूटिंग लंबी चलेगी। अपना म्यूजिक एलबम लांच करने की योजना है। गाने तैयार हो चुके हैं। एलबम को कैसे लॉन्च करना है, काम चल रहा है।

-रघुवेंद्र सिंह

Tuesday, February 8, 2011

जाएद लेकर आ रहे हैं लव ब्रेकअप ज़िन्दगी

अभिनेता जाएद खान अब निर्माता बन चुके हैं। अपने खास मित्र दीया मिर्जा और साहिल के संग उन्होंने प्रोडक्शन हाउस शुरू किया है। फरवरी में उनकी पहली फिल्म फ्लोर पर जा रही है। पिछले दिनों जाएद ने अपनी योजनाओं के बारे में बातचीत की।
फिल्म प्रोडक्शन में आने की जरूरत कब और क्यों महसूस हुई?
मैं प्रोडक्शन हाउस शुरू करने के बारे में हमेशा सोचता था, क्योंकि मैं जिस फैमिली से हूं उनका काम-धंधा यही है। प्रोडक्शन, डायरेक्शन, राइटिंग, एक्टिंग, एडीटिंग। यह काम मेरे लिए नया नहीं है। मैं प्रोडक्शन हाउस शुरू कर रहा हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सिर्फ अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए काम करूंगा। मैं प्रियन सर के साथ काम कर रहा हूं। मैंने दो और फिल्में साइन की हैं। फिल्म प्रोडक्शन में आने का मकसद यह है कि हम लोग अपनी सोच फिल्म में डाल सकें, नई पीढ़ी को मौका दें, मोटीवेशन दें, उन्हें हौसला दें।
दीया मिर्जा और साहिल के साथ टीम बनाने का निर्णय क्यों?
दीया, साहिल और मैं अच्छे दोस्त हैं। हम में एक स्ट्रेंथ है। जैसे साहिल में ग्रेट मार्केटिंग स्किल है, वे बहुत अच्छे राइटर हैं। दीया हमेशा सोशल कॉज से जुड़ी रही हैं। उनमें गुडविल है। वे अच्छी रीडर हैं। यह सब एक अच्छा सिनेमा क्रिएट करने में मदद करता है। जहां तक मेरी बात है, तो फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय से होने के कारण फिल्म प्रोडक्शन जानता हूं। नए आइडिया को कैसे बिल्ड किया जाता है, वह जानता हूं। कैसे प्रोजेक्ट को इंटरनेशनल लेवल पर ले जाते हैं, वह जानता हूं। मैंने लंदन फिल्म स्कूल में पढ़ाई की है। मैं प्रमोशन का तरीका जानता हूं। साथ ही हम एक अच्छी टीम हैं।
सिनेमा के क्षेत्र में भी बदलाव होगा?
जो भी सोशल रेलिवेंट टॉपिक होगा और जिस तरीके से पिक्चर में यूनिवर्सल अपील होनी चाहिए, वह हम नहीं छोड़ सकते। हमें दिमाग में यह बात रखकर चलनी होगी कि हम जो भी स्टोरी कह रहे हैं, उसमें एंटरटेनिंग फैक्टर और इकॉनॉमिक फैक्टर होना बहुत जरूरी है।
आपकी टीम यंग है तो क्या टारगेट भी यूथ ही होगा?
नहीं, ऐसा नहीं है कि टारगेट यूथ ही होगा। सच है कि यूथ बहुत बड़ा मार्केट है, पर पिक्चर तो सभी देखते हैं। ऐसा तो नहीं है कि किसी मजेदार सिचुएशन पर बुजुर्ग नहीं हंसेंगे। यहां हिंदी फिल्मों के ऑडियंस की बहुत बड़ी संख्या है, तो हमारी कोशिश यही होगी कि कैरेक्टर मजेदार हों, जिन्हें देखकर बुजुर्ग भी हंसें।
एक ओर दबंग जैसी मसाला फिल्म आती है और दूसरी ओर धोबी घाट जैसी अलग जॉनर की। आप क्या बनाएंगे?
यह बहुत पुरानी सोच है। देखें, तो ए वेडनेसडे सबके लिए नहीं बनी थी। आर्ट पिक्चर लग रही थी, लेकिन सबने पसंद किया। दबंग में रोमांस, कॉमेडी, ऐक्शन और सलमान खान थे। दबंग जैसी कई फिल्में नहीं भी चली हैं। आज हर कोई कुछ नया चाहता है। हमारी कंपनी का लक्ष्य है यूनीवर्सल अपील की फिल्में बनाना, जिसमें सब कुछ हो।
पहली स्क्रिप्ट फाइनल हो चुकी है?
एक स्क्रिप्ट फाइनल हो चुकी है। उसे हम इसी महीने अंत में शुरू कर रहे हैं। वह फ्लोर पर जाएगी, तब दूसरे पर काम शुरू होगा। उसे साहिल डायरेक्ट कर रहे हैं। बहुत ही प्यारी रोमांटिक कहानी है।
रघुवेंद्र सिंह

Sunday, February 6, 2011

शायद बज जाये शहनाई-सलमान खान

क्या सिनेमा का सबसे स्मार्ट कुंवारा इस साल करेगा शादी? खुद सलमान खान का जवाब है 'हाँ'
['दबंग' के लिए आपको कॅरियर में पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। क्या आगे भी इस पुरस्कार की उम्मीद कर रहे हैं?]
मुझे अवॉर्ड नहीं चाहिए। इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं तो चाहता हूं कि मुझे नॉमिनेट भी न करें और अगर नॉमिनेट करने से कोई माइलेज मिलती है, तो एक चेक मेरी संस्था बीइंग ह्यूंमन के नाम काट दें।
[तो फिल्म पुरस्कारों की आपकी नजर में कोई अहमियत नहीं है?]
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं तो अवॉर्ड फंक्शन में परफॉर्म करने जाता हूं। बस्स!
[अभिनव कश्यप के साथ आगे क्या प्लानिंग है?]
दबंग को रिपीट करेंगे। दबंग-2 बनाएंगे।
[आपकी आने वाली फिल्मों 'रेडी' और 'बॉडीगॉर्ड' को दबंग के ट्रैक पर बताया जा रहा है?]
नहीं-नहीं। यह बिल्कुल अलग फिल्में हैं। रेडी फुल ऑन कॉमेडी है और बॉडीगार्ड रोमांटिक एक्शन फिल्म है।
[दर्शक आपको इस साल भी टीवी पर देखेंगे?]
जरूर। प्रोमो, एड, सनसनी में देखेंगे। ब्रेकिंग न्यूज में देखेंगे। बिग बॉस में दोबारा बुलाया जाए तो देखेंगे। दस का दम में न्यौता आया तो देखेंगे।
[इस साल के लिए आपने क्या सोचा है? क्या करना है और क्या नहीं करना है?]
जो पिछले साल किया है, उससे डबल ही करना है।
[हिंदी सिनेमा को आप किस दिशा में जाते देख रहे हैं?]
ऐसा कोई फार्मूला नहीं है। हमने दबंग बनाई तो इंडस्ट्री के जितने भी लोग थे, सबने कहा कि पागल हो, मर जाओगे, डूब जाओगे। डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिल रहा था, फाइनेंसर नहीं मिल रहा था, कुछ भी नहीं मिल रहा था, लेकिन हमने पिक्चर बनाई और सबको बहुत पसंद आई। दर्शकों को बेवकूफ न समझकर, उनके एंटरटेनमेंट का ध्यान रखकर कोई पिक्चर बनाता है तो वह पिक्चर चलती है।
[कह सकते हैं कि अब आपने ऑडियंस की नब्ज पकड़ ली है?]
मुझे मेरी नब्ज ढूंढने में प्रॉब्लम होती है मैं ऑडियंस की नब्ज क्या पकडूंगा!
[क्या इस साल खुशखबरी सुन सकते हैं कि आप शादी करने जा रहे हैं?]
हाँ, सुन सकते हैं। जरूर सुन सकते हैं कि मैं शादी करने जा रहा हूं।
[रघुवेन्द्र सिंह]

ऊट पटांग-कैमरे का कमाल-फिल्म समीक्षा

मुख्य कलाकार : माही गिल, सौरभ शुक्ला, विनय पाठक
निर्माता-अपर्णा जोशी
निर्देशक- श्रीकांत वेलागलेटी
नए निर्देशक श्रीकांत वेलागलेटी के आकर्षक शीर्षक ऊट पटांग, विनय पाठक, सौरभ शुक्ला और माही गिल जैसे उम्दा कलाकारों की मौजूदगी से उम्मीद थी कि ऊट पटांग नए हिंदी सिनेमा की एक कड़ी साबित होगी, लेकिन सिवाय कैमरे के कमाल के फिल्म में कुछ भी सराहनीय नहीं है।
ऊट पटांग एक रात की कहानी है। कोयल और राम प्यार में धोखा खा चुके हैं। राम का जासूस दोस्त नंदू कोयल और राम को आमने-सामने बैठा देता है। पूर्व गर्लफ्रेंड संजना से प्यार में धोखा खाया राम कोयल का दुख बांटते-बांटते उसका दीवाना हो जाता है। संजना पैसे की खातिर राम को छोड़कर गैंगस्टर लकी से प्यार करती है, लेकिन वह उसे भी धोखा देकर उसके पांच करोड़ रुपये ले भागती है। पांच करोड़ रुपयों के चक्कर में नंदू, संजना और लकी के बीच चूहे-बिल्ली का आंख-मिचौली का खेल होता है। राम और कोयल अंजाने में इसका हिस्सा बन जाते हैं।
इसे लेखक-निर्देशक की कमजोरी कही जाएगी कि वे आधी फिल्म अपने किरदारों को स्थापित करने में निकाल देते हैं। दूसरे हिस्से में गैंगस्टर लकी के आने से कहानी में थोड़ी गति आती है। ऊट पटांग की विशेषता श्रीकांत का रिवर्स स्टाइल में फिल्मांकन का अंदाज है। एक ही कमरे के अंदर सभी पात्र मौजूद होते हैं, लेकिन वे अलग-अलग समय पर इसका रहस्योद्घाटन करते हैं। विनय पाठक डबल रोल में हैं। उन्होंने सीधे-सादे राम के व्यक्तित्व की सहजता को अच्छी तरह व्यक्त किया है, लेकिन गैंगस्टर लकी के किरदार में वे नाटकीय लगते हैं। फ्रेंच बोलने का उनका नाटकीय प्रयास हंसाता नहीं। माही गिल फिल्म में अनायास गालियां देती हैं और सिगरेट का धुआं उड़ाती हैं। सौरभ शुक्ला अपने किरदार में जंचे हैं। छोटी सी भूमिका में संजय मिश्रा प्रभावित करते हैं।
-दो स्टार
-रघुवेन्द्र सिंह