Monday, April 18, 2011

लोग याद नहीं करेंगे तो भी चलेगा-बिपाशा बसु


जॉन अब्राहम के साथ बिपाशा बसु के अलगाव पर संशय बरकरार है। बिपाशा की नई फिल्म दम मारो दम के नायक राणा दगुबाटी के साथ नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। निजी जीवन की उथल-पुथल के साथ बिपाशा हिंदी सिनेमा में दस वर्ष पूरा कर रही हैं। दम मारो दम के बहाने तरंग ने उनसे दस वर्ष के सफर, राणा दगुबाटी और जॉन अब्राहम के बारे में की बातचीत..।

दस वर्ष के सफर को पलटकर देखती हैं, तो कैसा लगता है?
टाइम इतनी जल्दी बीत जाता है, पता नहीं चलता। समझ में नहीं आ रहा कि दस साल कैसे बीत गए। मैं कोशिश करती हूं कि हर साल एक इंसान और ऐक्टर के तौर पर खुद को रिइंवेंट कर सकूं। मैं अपने काम को लेकर खुश हूं। रोमांचित हूं। मेरा हर साल अच्छा बीता है।
वे कौन सी फिल्में हैं, जिन्हें आप उल्लेखनीय मानती हैं? जिनके लिए लोग आपको याद रखेंगे?
लोग याद नहीं करेंगे, तो भी चलेगा। मैं अपने काम से खुश हूं। मैंने जिन फिल्मों में काम किया है, उन पर गर्व है। जिन फिल्मों की लोग तारीफ करेंगे वे राज, जिस्म, धूम 2, कॉरपोरेट, बचना ऐ हसीनों, लम्हा होंगी।
दम मारो दम में आपने जोई का किरदार निभाया है। वह समाज के किस वर्ग की लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती है?
जोई गोवा में पली-बढ़ी है। मां इंडियन हैं, फादर इंग्लिश थे। वह बहुत भाषाएं जानती है। वह एयर होस्टेस बनना चाहती है। उसका सपना बड़ा नहीं है। वह सिंपल है। वह लाइफ को खुलकर जीना चाहती है, लेकिन अचानक उसकी जिंदगी बदल जाती है। दम मारो दम की टैग लाइन है, क्या है कहानी तेरे बाप की। इसमें हर कैरेक्टर की एक इमोशनल जर्नी है। जोई हिंदी फिल्मों की टिपीकल हीरोइन नहीं है। इस फिल्म का हर किरदार नया है।
गोवा फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि है। क्या हम इसमें गोवा को एक नए रूप में देखेंगे?
हमारे कैमरामैन ने गोवा को नए अंदाज में शूट किया है। यह फिल्म ड्रग कारोबार पर है। हम यह कहानी कहीं भी बना सकते थे, लेकिन गोवा में बनाने के कारण कैरेक्टर को स्टाइलिश लुक मिल गया। गोवा की अपनी खूबसूरती तो है ही। राज और जिस्म से आपकी पहचान सेक्सी गर्ल की बनी। उसके बाद आपने लम्हा और आक्रोश आदि में नॉन ग्लैमरस किरदार किए।
इस फिल्म की जोई में क्या दोनों का मिश्रण देखने को मिलेगा?
फिल्म में हमारा पहनावा किरदार के हिसाब से होता है। यदि मैं डांसर का किरदार करूंगी, तो वैसा ड्रेस पहनूंगी। लम्हा में कश्मीरी लड़की का किरदार निभाया था। उसका लुक अलग था। आक्रोश में सिंपल कॉटन साड़ी पहनी थी। मैंने हमेशा मिक्स कैरेक्टर किए। आपकी इमेज जैसी बन जाती है फिर आपके पास वैसे किरदार आते हैं। जब एक बार आपकी अपनी पहचान बन जाती है तो आप प्रयोग कर सकते हैं। मेरे करियर की शुरुआत में ऐसा ही हुआ, लेकिन अब मैं प्रयोग करती हूं।
दम मारो दम में रोहन सिप्पी के निर्देशन का अनुभव कैसा रहा?
रोहन सुलझे हुए डायरेक्टर हैं। वे क्लीयर थे कि उन्हें कलाकारों से क्या चाहिए। वे अपने कलाकारों को फ्रीडम देते हैं। हम उनकी खिंचाई भी कर सकते थे, लेकिन वे इतने स्वीट हैं कि हमने कुछ नहीं किया।
राणा दगुबाटी इसमें आपके नायक हैं। उनके साथ कैसी केमिस्ट्री रही?
वे अच्छे कलाकार हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है। उन्हें हिंदी नहीं आती, लेकिन तब मैं हैरान रह गई जब सेट पर देखा कि उन्हें अपने डायलॉग के अलावा मेरे और अभिषेक बच्चन के डायलॉग भी याद थे। वे मेहनती हैं।
जॉन के साथ आपके ब्रेकअप की बात चर्चा में है। सच क्या है?
मैं जॉन के बारे में बहुत कुछ बोल चुकी हूं। वह मेरी जान है। इस बारे में और कोई सफाई मुझे नहीं देनी है। वैसे भी यह सब चलता रहेगा..
-रघुवेंद्र सिंह 

ईगो फिल्म से बड़ा नही: ओनिर


माई ब्रदर निखिल, बस एक पल और सॉरी भाई के बाद आई एम ओनिर की चौथी फिल्म है। इसे वे अपनी सबसे स्पेशल फिल्म मानते हैं। फिल्म को लेकर बातचीत ओनिर से।

शीर्षक से लगता है कि यह फिल्म अस्तित्व की कहानी है?
यह अस्तित्व के खोज की कहानी है। टैगोर की गीतांजलि की एक कविता फिल्म की प्रेरणा है। फिल्म के सभी किरदारों का एक ही सपना है कि वे बिना किसी भय के अपनी जिंदगी सम्मान से जी सकें। किरदारों की पर्सनल, पॉलिटिकल और जेंडर हिस्ट्री है। इसमें चार कहानियां ओमार, मेघा, आफिया और अभिमन्यु हैं। कहानी के सभी किरदार एक-दूसरे से जुड़े हैं।
दर्शकों की पसंद के कॉमर्शियल सिनेमा में आपकी रुचि नहीं है?
यह गलतफहमी है। आम आदमी की पसंद को ध्यान में रखकर कुछ लोग सौ करोड़ की फिल्म बनाते हैं और उन्हें अस्सी करोड़ का लॉस होता है। तीन करोड़ की फिल्म तेरह करोड़ का बिजनेस करती है। प्रॉब्लम टिकट प्राइस है। पहले एक दिन में लोग तीन शो देख सकते थे, लेकिन आज टिकट इतना मंहगा है कि लोग एक फिल्म देखने जाने से पहले सोचते हैं।
आई एम के प्रचार के लिए आप फेसबुक और ट्विटर पर जोर दे रहे हैं। क्यों और क्या भविष्य में ये माध्यम लोकप्रिय होंगे?
मेरे पास मीडिया नेट के लिए पैसे नहीं हैं। जब टीवी आया था, तो लोग कहने लगे थे कि टीवी ने थिएटर को बंद कर दिया, लेकिन थिएटर आज भी मौजूद हैं। कोई माध्यम पूरी तरह खत्म नहीं होता। फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यम भविष्य में मजबूत होंगे। बहुत जल्द इंडिया में मोबाइल टीवी का चलन भी बढ़ेगा।
आई एम के निर्माण के संघर्षमय दौर को क्या आपने एंज्वॉय किया?
मैं एक लाख रुपए के लिए कॉफी पीने दिल्ली चला जाता था। एक इंसान के तौर पर इस फिल्म ने मुझे विनम्र बना दिया। मुझे लोगों से जुड़ने का मौका मिला। लोग कहते थे कि आप इतने बड़े डायरेक्टर होकर फिल्म के लिए पैसा मांग रहे हैं? मैं कहता था कि मेरी फिल्म से बड़ा मेरा इगो नहीं है। अगली फिल्म की कहानी मुझे इसी प्रोसेस में मिली है।
-रघुवेंद्र सिंह 

लाइफ ने टर्न लिया: राणा दगुबाटी


छह फुट तीन इंच लंबे राणा दगुबाटी आजकल बिपाशा बसु से प्रेम संबंध को लेकर चर्चा में हैं। वे दक्षिण भारत के एक बड़े फिल्म घराने से हैं। पिछले साल फरवरी में प्रदर्शित हुई अपनी पहली फिल्म लीडर से वे तेलुगू सिनेमा के स्टार बन गए। रोहन सिप्पी की दम मारो दम उनकी पहली हिंदी फिल्म है। पिछले दिनों राणा ने हम से बातचीत की। प्रस्तुत हैं अंश..

पहली फिल्म से आप दक्षिण भारत में स्टार बन गए। हिंदी फिल्म साइन करते वक्त किसी तरह का दबाव महसूस कर रहे थे?
दम मारो दम मैंने लीडर की रिलीज के पहले साइन की थी। दिसंबर 2009 में लीडर का पहला प्रोमो आया था। रोहन सिप्पी ने प्रोमो देखा और मुझे फोन किया। उन्होंने कहा कि मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी है। आप सुनिए और अगर पसंद आती है, तो हम साथ काम करेंगे। उन्होंने दम मारो दम का फ‌र्स्ट ड्राफ्ट मेरे पास भेजा। मुझे स्क्रिप्ट पसंद आई। उसके बाद मेरी लाइफ ने खूबसूरत टर्न लिया।
आप फिल्म घराने में पैदा हुए, तो क्या बचपन से तय था कि ऐक्टर ही बनेंगे?
मैं विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर था। मैंने स्प्रिट मीडिया कंपनी शुरू की थी। बाद में कंपनी प्राइम फोकस में मर्ज हो गई। फिर मैंने दो तेलुगू फिल्में प्रोड्यूस कीं, जिनमें से एक फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला। उसके बाद मैं सुरेश प्रोडक्शन में लाइन प्रोड्यूसर था। बाद में मैंने खुद को डिस्कवर किया। यह मेरी तीसरी जॉब है।
ऐक्टर बनने के लिए कोई तैयारी भी की?
बैरी जॉन के एक्टिंग स्कूल में मैंने एक साल ट्रेनिंग ली। उसके बाद स्टंट सीखने के लिए अमेरिका गया। मेरी हिंदी अच्छी नहीं है। दम मारो दम की शूटिंग से पहले एक महीने हमने रोहन के साथ वर्कशॉप की। मैंने शूटिंग से डेढ़ महीने पहले फिल्म की स्क्रिप्ट मांग ली थी। मुझे हिंदी पर काम करना पड़ा।
हिंदी फिल्मों से आपका परिचय कब हुआ? क्या पहली फिल्म याद है?
बचपन से मैं हिंदी फिल्में देख रहा हूं। हैदराबाद में हिंदी फिल्में देखी जाती हैं। मैंने बच्चन साहब की फिल्में देखी हैं। तमिल और तेलुगू फिल्में मैंने हिंदी फिल्मों की तुलना में अधिक देखी हैं।
फिल्म फैमिली से होने का सबसे बड़ा लाभ क्या मिला?
मुझे लगा कि मैं बचपन से एक्टिंग स्कूल में पढ़ रहा हूं। फिल्मी फैमिली से हूं, तो इंडस्ट्री को करीब से देखा। मैंने फिल्म मेकिंग के टेक्निकल पहलू के बारे में कम उम्र में जान लिया था। मैं इसके अलावा और कुछ नहीं जानता।
दम मारो दम में आप डीजे जोकी का किरदार निभा रहे हैं। जोकी किस तरह का लड़का है?
वह बहुत शांत किस्म का है। वह चीजों को घटते हुए देखता है, लेकिन कुछ बोलता नहीं है। जिसके कारण उसे पसंद करने वाले लोग धीरे-धीरे उससे अलग हो जाते हैं। फिल्म में तीन कहानियां हैं। एक पुलिस अफसर, एक स्टूडेंट और एक आरजे जोकी की।
इसमें बिपाशा बसु आपके अपोजिट हैं। उनके साथ प्रेम संबंध की चर्चा क्या फिल्म के प्रचार का हिस्सा है?
बिपाशा स्वीट हैं। मैं न्यूकमर हूं। उन्होंने मुझे हमेशा सपोर्ट किया। मैं उनकी इज्जत करता हूं। उनके साथ लिंक अप की खबरें गलत हैं। हो सकता है कि हमारे लिंक अप की खबर प्रचार का हिस्सा हो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि सिर्फ इसके कारण कोई फिल्म देखने आएगा।
भविष्य में हिंदी और तेलुगू फिल्मों में से आप किसे प्राथमिकता देंगे?
मैं अलग-अलग भाषा की फिल्में करना चाहता हूं। मैं खुश हूं कि इतनी कम उम्र में मुझे अलग-अलग सिनेमा का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है। दम मारो दम की स्टोरी टेलिंग डिफरेंट है। हमारे यहां ऐसी फिल्में नहीं बनतीं और हिंदी में भी यह एक नया प्रयोग है।
-रघुवेंद्र सिंह 

Saturday, April 2, 2011

शबाना आजमी ने किया मुझे ट्रेंड-सारा जेन डायस

ग्लैमर का आकर्षण बचपन से था
चार साल की उम्र से ही मैं ग्लैमर व‌र्ल्ड की ओर आकर्षित हो गई थी। मम्मी के साथ मैं टीवी पर मिस व‌र्ल्ड और मिस इंडिया काटेस्ट का प्रसारण देखती थी। तब मैंने सोचा कि बड़ी होकर मिस इंडिया बनूंगी। स्कूल जाना शुरू किया, तो सास्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगी। कॉलेज में भी स्टेज पर सक्रिय थी। मुझे परफॉर्मर बनना था। पापा काम के सिलसिले में मस्कट गए और बाद में उन्होंने मम्मी, बहन और मुझे भी मुंबई से मस्कट बुला लिया। पद्रह साल मैं मस्कट में रही। मॉडलिग करना मैंने वहीं शुरू कर दिया था। यद्यपि मैंने मस्कट में वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक सीखा है, पर एक्टिंग और डास की प्रोफेशनल ट्रेनिग नहीं ली है।
सघर्ष के दौरान तैयारी करती रही
मेरा सघर्ष लबा रहा। मस्कट से मुंबई आई, तो अंजान शहर लगा। फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कोई परिचित नहीं था। मैं लगभग रोज ऑडिशन देती थी। उस सघर्ष ने मुझे पहली फिल्म के लिए तैयार किया। मैं लकी थी कि मुझे सही समय पर सही लोग मिलते रहे। मेरी एक दोस्त हैं नदिनी, जोकि कास्टिंग एजेंट हैं। उन्होंने मुझे 'गेम' फिल्म के बारे में बताया और कहा अगर तुम इंट्रेस्टेड हो तो आकर ऑडिशन दे दो। मैंने ऑडिशन दिया। अभिनय देव को मेरा ऑडिशन अच्छा लगा। मैं बहुत खुश हूं कि 'गेम' जैसी बड़े बैनर की फिल्म मुझे मिली। 'गेम' से पहले मैंने एक तमिल फिल्म की थी।
लकी हूं
माइंड गेम है यह फिल्म। अभिनय देव ने जब मुझे माया के किरदार के बारे में बताया, तो मैं उससे कनेक्ट नहीं कर पाई। माया अपने हालात से भागना चाहती है। माया और मुझमें दिन-रात का फर्क है। फिर एक्सेल एंटरटेनमेंट ने शबाना आजमी से सपर्क किया। उन्हें बताया गया कि सारा को आपकी मदद की जरूरत है। मैं लकी हूं कि शबाना जी और अभिनय ने मुझे ट्रेनिग दी। शबाना जी ने मुझे अपनी फिल्म 'मडी' देखने के लिए कहा। उनकी और अभिनय की मदद से मैं माया के किरदार को निभाने में कामयाब हो पाई।
हार्ड वर्क में है यकीन
छह महीने पहले किसी ने मुझसे कहा कि तुम हिंदी अच्छी नहीं बोल पाती हो। मैंने इसे चुनौती माना और मेहनत की। कुछ लोग मेरा नाम सुनकर सोचते हैं कि मुझे हिंदी बोलनी नहीं आती होगी, पर मुझसे बात करने के बाद उनकी सोच बदल जाती है। मैंने एक्टिंग करना शुरू कर दिया है, लेकिन अभी लक्ष्य के बारे में नहीं सोचा। अभी मैं खुद को ढूंढ रही हूं। इतना जानती हूं कि मुझे अच्छे किरदार करने हैं।
-रघुवेन्द्र सिह

डांस मेरा पहला प्यार: रेमो डिसूजा



फिल्म निर्देशन में आने का फैसला आपने कब किया?
कोरियोग्राफी के बाद मेरा अगला कदम फिल्म निर्देशन ही था। मैंने अपने जीवन पर एक फिल्म लिखी थी। चार साल पहले मैंने उस पर बांग्ला फिल्म बनाई। वह फिल्म बंगाल के लोकप्रिय डांस फॉर्म छउ पर आधारित थी। उसके लिए मुझे बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला।
क्या निर्देशक बनने के लिए फिल्म मेकिंग की प्रोफेशनल ट्रेनिंग जरूरी है?
जो लोग फिल्म निर्माण से काफी साल से जुड़े हैं, उन्हें फिल्म मेकिंग की प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी ट्रेनिंग सेट पर चलती रहती है। मैं पंद्रह साल से फिल्म निर्माण से जुड़ा हुआ हूं। मुझे टेक्निकल जानकारी है। नए लोगों को मेकिंग की ट्रेनिंग चाहिए।
फालतू के निर्माण की योजना कैसे बनी?
न्यूजीलैंड में कल किसने देखा फिल्म की शूटिंग चल रही थी। सेट पर मैंने जैकी से बताया कि एक कॉमर्शियल फिल्म बनाना चाहता हूं। उसका विषय भी बताया। संयोग से जैकी भी वैसे विषय पर ही फिल्म बनाने की सोच रहे थे।
यह फिल्म आपके पसंद की है या दर्शकों के पसंद की..?
मैं उन फिल्म डायरेक्टर से रिलेट नहीं कर पाता जो खुद के लिए फिल्म बनाते हैं। मेरा मानना है कि आपको दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए अपनी क्रिएटिविटी का इस्तेमाल करके फिल्म बनानी चाहिए। फालतू में दर्शकों की पसंद का ध्यान रखा गया है। इसमें मेरी क्रिएटिविटी है।
यह फिल्म एंटरटेन करने के साथ कोई मैसेज भी देती है?
यह चार युवा की कहानी है। उनका परसेंटेज बहुत कम है, इसलिए उन्हें किसी कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलता। लोग उन्हें फालतू कहते हैं। वे बच्चे कैसे अपना मुकाम हासिल करते हैं और कैसे साबित करते हैं, यही फिल्म की कहानी है। दर्शकों को फिल्म फ्रेश लगेगी।
फिल्म निर्देशन का अनुभव कैसा रहा?
कमाल का अनुभव रहा। कॉमर्शियल फिल्म बनाकर मैंने सीखा कि इस प्रकार की फिल्म बनाते समय आपको कितने लोगों का ध्यान रखना पड़ता है। निर्देशन मामूली बात नहीं है।
भविष्य में कोरियोग्राफी और फिल्म निर्देशन में किस पर ज्यादा ध्यान देंगे?
मैं दोनों के बीच बैलेंस बनाकर चलना चाहता हूं। कोरियोग्राफी मेरा पहला प्यार है। फिल्म बनाना पैशन है।
अगली फिल्म किस प्रकार की होगी?
मैंने दो फिल्मों की स्क्रिप्ट फाइनल की है। एक ऐक्शन फिल्म होगी और दूसरी म्यूजिकल। 
-रघुवेंद्र सिंह 

अप्रैल फूल बनाया...

फिल्मी सितारे एक अप्रैल यानी मूर्ख दिवस का इंतजार नहीं करते। वे अपने सह-कलाकारों को पूरे साल बेवकूफ बनाने का अवसर तलाशते रहते हैं। अक्षय कुमार, अजय देवगन और अभिषेक बच्चन ऐसे मजेदार किस्सों के लिए चर्चित हैं। इन्होंने ऐसा करके कई हीरोइनों के होश उड़ा दिए थे। उनके मजाक की वजह से कई बार हीरोइनों को शर्मसार भी होना पड़ा है और वे मूर्ख भी बनीं..। 
होश उड़े सोनम के
खतरों के खिलाड़ी अक्षय कुमार अभिनेत्रियों के साथ प्रैंक करने में अव्वल माने जाते हैं। उनके साथ फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेत्रियां बहुत सतर्क रहती हैं, बावजूद इसके अक्षय हमेशा बाजी मार लेते हैं। अक्षय की शरारतों से वाकिफ होने के बावजूद सोनम कपूर थैंक्यू फिल्म के सेट पर आखिरकार शिकार बन ही गई। अक्षय उनके होश उड़ाने में सफल हो गए। अक्षय को पता चला कि सोनम को अपने मोबाइल से बहुत प्यार है। वे एक पल भी मोबाइल के बिना नहीं रह सकतीं। खिलाड़ी अक्षय ने सोनम के मोबाइल को ही गायब कर दिया। सोनम को जब अहसास हुआ कि उनका मोबाइल उनके पास नहीं है, तो उन्होंने सेट पर हंगामा मच गया। उन्होंने सेट पर सबकी ऐसी की तैसी करनी शुरू कर दी, लेकिन तभी उन्हें अक्षय के हुनर के बारे में पता चला। उन्होंने उनकी ओर शक की निगाहों से देखा तो अक्षय ने साफ मना कर दिया, लेकिन तभी सोनम की नजर अक्षय के पैंट की पीछे की जेब पर पड़ी। उन्हें अपना मोबाइल नजर आ गया। फिर सोनम ने अक्षय की जेब से अपना मोबाइल निकाल लिया और उन्हें राहत मिली, लेकिन कुछ समय के लिए सोनम के तो जैसे होश ही उड़ गए थे।
शरमा गई कट्रीना
अमूमन धीर-गंभीर दिखने वाले अजय देवगन की शरारत के अनेक किस्से उनके साथ काम कर चुके कलाकारों के पास हैं। एक किस्सा राजनीति फिल्म में उनकी सह-कलाकार रहीं कट्रीना कैफ के पास भी है, जिसे वे कभी नहीं भूलेंगी। भोपाल में फिल्म की शूटिंग के दौरान अजय ने रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और मनोज बाजपेयी के साथ मिलकर कट्रीना के साथ एक गंभीर मजाक करने की योजना बनाई। रात के बारह बजने से कुछ समय पहले अपनी टीम के साथ उन्होंने धीर-गंभीर अंदाज में कट्रीना के कमरे में प्रवेश किया। उन्होंने कट्रीना से कहा, आज नाना पाटेकर का जन्मदिन है और हम लोग उन्हें सरप्राइज देना चाहते हैं। कट्रीना फौरन अजय की बात मान गई और उन्होंने कहा, मैं सबसे पहले नाना को विश करके सरप्राइज दूंगी। अजय फौरन मान गए और उन्होंने एक गिफ्ट का पैकेट कट्रीना के हाथ में दे दिया। रात बारह बजे जब अचानक कट्रीना नाना के कमरे में पहुंचीं तो वे दंग रह गए। नाना कुछ सोच पाते कि उससे पहले ही कट्रीना ने उन्हें पैकेट थमाते हुए जन्मदिन की बधाई दे दी। नाना ने जब बताया कि उनका जन्मदिन नहीं है, तो कट्रीना को अहसास हुआ। तभी पीछे से अजय ने अपनी गैंग के साथ ठहाका मारते हुए कमरे में प्रवेश किया। पर अभी कट्रीना के साथ कुछ ऐसा होना बाकी था, जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी। नाना ने पैकेट खोला तो उसमें से अंडरवियर, जूते और मोजे निकले। कट्रीना शर्म के मारे पानी-पानी हो गई। उन्होंने वहां से भागने में ही भलाई समझी।
संभलकर दीपिका
दीपिका पादुकोण खुशमिजाज नेचर की हैं। उन्हें हंसना-हंसाना अच्छा लगता है। आशुतोष गोवारीकर की फिल्म खेलें हम जी जान से की नाइट शूटिंग के दौरान वे गोवा के सावंतवाड़ी में एक छोटे से जंगल में अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही मूड में थीं। तभी अभिषेक बच्चन वहां पहुंचे। उन्होंने फौरन दीपिका को हिदायत दी, रात का समय है। जरा संभल कर..। दीपिका ने हंसते हुए कारण पूछा तो अभिषेक ने कहा, डरने की कोई बात नहीं है। हां, सावंतवाड़ी का यह बाहरी इलाका सांप के लिए फेमस है। यहां रात के समय सांप निकलते हैं। सांप का नाम सुनते ही दीपिका की हंसी गायब हो गई। उन्होंने कुर्सी मंगवाई और लाइट के पास सचेत होकर बैठ गई। दीपिका का तनाव भरा चेहरा देखकर हंसी रोकते हुए अभिषेक ने दीपिका से फिर कहा, गलती से भी अपना पैर जमीन पर न रखना। सांप के डर से ही मैं तीन कुर्सियों के ऊपर बैठा हूं। तीन कुर्सियों की बात से दीपिका को समझ में आया और वे भी तीन कुर्सी लगाकर बैठ गई। जब आशुतोष गोवारीकर ने पूछा कि क्या बात है, तो सभी जोर से हंस पड़े। उसके बाद दीपिका जान गई कि अभिषेक ने उन्हें मूर्ख बनाया है। फिर उन्हें याद भी आया कि तीन कुर्सियों पर बैठना अभिषेक की आदत है। 
-रघुवेंद्र सिंह 

हूं ऐसा ही: प्रतीक बब्बर

फिल्म धोबी घाट में अभिनेता आमिर खान की मौजूदगी के बावजूद सबका ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल हुए प्रतीक बब्बर। फिल्म में उन्होंने साबित किया कि उनका लुक और पर्सनैल्टी भले ही हिंदी फिल्मों के अभिनेता जैसी नहीं है, लेकिन वे अपने अभिनय से सबका दिल जीतने का दम रखते हैं। शायद यही वजह है कि रोहन सिप्पी ने अपनी नई फिल्म दम मारो दम में अभिषेक बच्चन जैसे स्थापित अभिनेता के रहते हुए कहानी का केंद्र प्रतीक को बनाना उचित समझा। चौंकिए मत, दम मारो दम की कहानी के नायक हैं युवा प्रतीक। उम्मीद से ज्यादा रफ्तार से आगे बढ़ रहे प्रतीक अपनी इन उपलब्धियों से बहुत खुश हैं। बस उन्हें एक बात का दुख है। प्रतीक कहते हैं, काश! मेरी मम्मी जीवित होतीं। मेरी सफलता को देखकर वे बहुत खुश होतीं। मैं उन्हें बहुत मिस कर रहा हूं। 

मां के प्यार पाने से वंचित रहे प्रतीक अपने अब तक के सफर में ज्यादातर अकेले रहे हैं। उनकी परवरिश नाना-नानी के घर हुई। पिता के प्यार के मामले में भी उनकी किस्मत दूसरे बेटों जैसी नहीं रही। उन्हें पिता राज बब्बर का अपेक्षित प्यार नहीं मिला। प्रतीक आज शबाना आजमी में अपनी मां को देखते हैं, तो आमिर खान में बड़ा भाई। स्नेहिल रिश्तों की छांव से वंचित रहे प्रतीक बिना किसी संकोच के कहते हैं, शबाना आंटी में मुझे मेरी मां नजर आती हैं। वे मुझे बेटे जैसा प्यार देती हैं। आमिर बड़े भाई की तरह मुझे गाइड करते हैं। डांटते हैं और प्यार भी करते हैं।
प्रतीक अंतर्मुखी हैं। वे अपने दिल की बात खुलकर किसी से नहीं कह पाते। वे चुप रहना पसंद करते हैं। सवालों का जवाब वे कम शब्दों में देते हैं और अपनी दुनिया में खोए से रहते हैं। मीडिया से उनके व्यक्तित्व का यह पहलू छुपा नहीं है। प्रतीक कहते हैं, मैं बचपन से ऐसा ही हूं। बहुत कम बोलता हूं। मुझे जानने वाले लोग इस बात से परिचित हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्रतीक की यही बात उनकी विशेषता बन गई है। हिंदी फिल्मकारों को उनके रूप में अपनी कहानी के रोचक किरदार को जीवंत करने वाला एक अनूठा कलाकार मिल गया है। जाने तू या जाने ना का अमित हो या धोबी घाट का मुन्ना, दोनों ही रोचक किरदार थे। गोवा की पृष्ठभूमि पर रची-बसी और मादक द्रव्यों के व्यापार पर आधारित रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम में भी प्रतीक ने एक अलग किस्म का किरदार निभाया है। इसमें उनके द्वारा अभिनीत लॉरी का किरदार है तो स्टूडेंट, लेकिन वह अब तक हिंदी फिल्मों में दिखे स्टूडेंट जैसा नहीं है। प्रतीक के अनुसार, फिल्म दम मारो दम में मेरा किरदार अलग किस्म का है। मुझे उम्मीद है, लोग मेरे किरदार को पसंद करेंगे। गौरतलब है कि इस फिल्म में प्रतीक ने अभिषेक बच्चन के अलावा बिपाशा बसु के साथ काम किया है। प्रतीक ने हाल में प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण की शूटिंग पूरी की है। उनके लिए खुशी की बात यह है कि इसमें उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका मिला। अमिताभ बच्चन उनकी मम्मी स्मिता पाटिल के को-स्टार रह चुके हैं और जाने तू या जाने ना देखने के बाद उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि प्रतीक ने उन्हें स्मिता की याद दिला दी। प्रतीक बिग बी के साथ काम करके बेहद खुश हैं। वे कहते हैं, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं गर्व महसूस कर रहा हूं। प्रतीक की गिनती आज हॉट युवा कलाकारों में हो रही है। दम मारो दम और आरक्षण के बाद उनकी अगली फिल्म संजय लीला भंसाली के होम प्रोडक्शन की माई फ्रेंड पिंटो होगी। वे कहते हैं, मैं धीरे-धीरे और सधे कदम बढ़ा रहा हूं। 
-रघुवेंद्र सिंह