Wednesday, May 20, 2020

सिनेमा ने मुझे बिगाड़ दिया 

-रघुवेन्द्र सिंह 

हिंदी सिनेमा के स्तम्भ अमिताभ बच्चन 

'बाइस्कोप देखकर बच्चे खराब हो जाते हैं।' मेरे कलकतिहवा बाबा (कलकत्ता रिटर्न) हमेशा यह बात कहा करते थे। उनकी यह बात छोटे बाबा, आजी, चाचा, पापा और आधुनिक सोच रखने वाली मेरी अम्मा के मस्तिष्क में भी बैठ चुकी थी। यह वजह है कि हमारे घर के किसी भी सदस्य, चाहे वह बच्चे हों या बड़े, को बाइस्कोप देखने की छूट नहीं थी। लड़कियों को तो बिल्कुल ही नहीं। मैं आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) के बगहीडाड़ गांव में पला-बढ़ा हूं। सन् 1991-92 की बात है। मुझे अच्छी तरह याद है, पूरे गांव में एकमात्र मेरे घर पर टीवी था। वह ब्लैक एन व्हाइट था। वह टीवी केवल उसी वक्त स्टार्ट किया जाता था, जब समाचार आ रहा होता था या फिर कोई धार्मिक या देशभक्ति सीरियल। टीवी घर से बाहर बैठक में लगाया गया था। ताकि घर की औरतें कोई कार्यक्रम न देख सकें। टीवी देखने से आंखें खराब हो जाती हैं और सबकी आदतें भी। समय की बर्बादी तो होती ही है। यह कलकतिहवा बाबा कहते थे। हां, कोई बढिय़ा बाइस्कोप आता था तो कलकतिहवा बाबा खुद ही घर की औरतों और बच्चों को बुलवा लेते थे। बढिय़ा बाइस्कोप से उनका तात्पर्य यह था जिसे सपरिवार देखा जा सके। उनमें धार्मिक एवं पारिवारिक बाइस्कोप के नाम आते थे। हीरो-हीरोइन के रोमांस एवं मार-धाड़ वाला बाइस्कोप देखने की इजाजत बिल्कुल नहीं थी।

नटखट विद्या बालन की मस्ती 

मेरे मंझले चाचा की बेटी वंदना गोरखपुर में अपने मामा के यहां रहकर पढ़ाई करती थीं। वे मुझसे चार साल बड़ी हैं। उस वक्त मैं उनका सबसे प्यारा भाई और दोस्त हुआ करता था। दीदी के हिसाब से उनके मामा-मामी आधुनिक थे, क्योंकि वे लोग फिल्में देखना बुरी बात नहीं मानते थे। मैंने दीदी से अप्रत्यक्ष रूप से सीखा कि बाइस्कोप को फिल्में भी कहते हैं। अब मैं बाइस्कोप को फिल्म कहने लगा। दीदी माधुरी दीक्षित की बहुत बड़ी फैन थीं। वे माधुरी की प्रत्येक फिल्म रिलीज होते ही सिनेमाहाल में जाकर देख लेती थीं। फिल्म देखने के तुरंत बाद वे गोरखपुर से मुझे चिट्ठी लिखकर भेजतीं। उस चिट्ठी में वे अपना समाचार कम लिखतीं और माधुरी की फिल्मों के बारे में विस्तार से बताती थीं। माधुरी की 'साजन', 'बेटा', 'खलनायक' और 'दिल तो पागल है' फिल्में मैंने उनकी चिट्ठियों के जरिए देखी हैं। जिस चिट्ठी में वे लिखती कि मैं फलां तारीख को घर आ रही हूं तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। मैं बेसब्री से उनका इंतजार करता था। जैसे ही वे घर आतीं, मैं उनके पीछे-पीछे लग जाता था। अमूमन वे गर्मियों की छुट्टी में घर आती थीं। हम सब गर्मी में घर की छत पर सोते थे। रात को जल्दी से खाना खाकर हम छत पर बिस्तर लगा लेते और दीदी जैसे ही छत पर आतीं, घर के सभी लडक़े-लड़कियां उन्हें घेरकर बैठ जाते। उसके बाद वे फिल्मों की कहानी विस्तार से बतातीं। फिल्म की कहानी बताते समय वे माधुरी के लटके झटकों, मुस्कुराहट और उसकी अदाओं को एक्ट करके बताती थीं। बड़ा मजा आता था।

माधुरी दीक्षित जैसा कोई नहीं 

अब मैं भी माधुरी दीक्षित का फैन बन चुका था। जिस अखबार या मैगजीन में माधुरी की तस्वीर दिख जाती, उसे काटकर रख लेता था। नए वर्ष पर भेजने वाले ग्रीटिंग कार्ड भी माधुरी की फिल्मों वाले खरीदता था। मेरे स्कूल की कॉपी और किताबों की जिल्द पर माधुरी की तस्वीर वाले कवर चढ़ चुके थे। मैं पढ़ाई शुरू करने से पहले किताबों को प्रणाम करता तो मेरी अम्मा पूछ देती थीं कि तुम विद्या मां के पैर छूते हो या माधुरी दीक्षित के? उन दिनों माधुरी का एक गाना दीदी तेरा देवर दीवाना खूब बज रहा था। हर तरफ उस गाने के बारे में लोग बात कर रहे थे। दीदी ने भी मुझे चिट्ठी लिखकर बता दिया था कि माधुरी की बेस्ट फिल्म है, हो सके तो इसे जरूर देखना। मैंने अम्मा से वह फिल्म देखने की गुजारिश की, लेकिन जवाब ना मिला।

मेरी अम्मा जन्मदिन का केक खिलाती हुईं  

गर्मी की छुट्टियां शुरू हो चुकी थीं। मुझे और छोटे भाई को लेकर अम्मा मामा के गांव कपरियाडीह गयी थीं। कपरियाडीह मऊ के घोसी जिले में पड़ता है। मामा के गांव पहुंचकर मैंने देखा कि वहां भी दीदी तेरा देवर दीवाना का शोर मचा हुआ है। मेरी दोनों मौसी, मामी और उनकी बेटी अम्मा से हम आपके हैं कौन फिल्म दिखाने की जिद करने लगीं। अम्मा ने पूछा कि हम आपके हैं कौन किसकी फिल्म है? उन्होंने बताया कि यह वही फिल्म है जिसका गाना दीदी तेरा देवर दीवाना आजकल खूब बज रहा है। उन लोगों ने अम्मा को बताया कि पड़ोस के कुछ लोग फिल्म देखकर आए हैं। वे बता रहे हैं कि पारिवारिक फिल्म है। इसे जरूर देखना चाहिए। मामा के यहां भी किसी को सिनेमाहाल में फिल्म देखने की इजाजत नहीं थी। अम्मा नाना-नानी की दुलारी बेटी हैं। सबको पता था कि यदि वे सबको फिल्म दिखाने ले जाएंगी तो कोई मना नहीं करेगा। अम्मा ने सबकी बात सुन ली और हम आपके हैं कौन देखने जाने के लिए हां कह दिया। अब समस्या यह थी कि सब लोग जाएंगे कैसे? अम्मा ने एक जीप बुक की। इस बात की जानकारी जब पड़ोस की औरतों को मिली तो वे भी फिल्म देखने जाने के लिए तैयार हो गयीं।

जानकी कुटीर की होली पार्टी में अपनी प्रेरणा शबाना आज़मी के संग  

एक दिन पहले ही घर के सभी लोग फिल्म देखने की तैयारी में लग गए। सबने नए कपड़े निकालकर रख लिए। जिस कपड़े की क्लिच बिगड़ गयी थी, उसे प्रेस किया गया। ऐसा लग रहा था जैसे घर में शादी होने वाली है। दूसरे दिन सुबह उठकर फटाफट सब नहा धोकर तैयार हो गए। जीप आने में थोड़ी देर हुई तो लोग व्याकुल हो गए। नाना को भेजकर जीप को बुलाया गया। उसके बाद मामा, दोनों मामी, दोनों मौसी, अम्मा, पड़ोस की दो औरतें, उनके बच्चे, मैं और छोटा भाई जीप में ठूंसकर घोसी फिल्म देखने रवाना हुए। वहां पहुंचकर हमने देखा कि विजय सिनेमाहाल के बाहर भारी भीड़ लगी है। उस भीड़ में बच्चे, बड़े, बूढ़े, नौजवान, औरतें सब शामिल थे। भीड़ देखकर हम लोग घबरा गए कि पता नहीं टिकट मिलेगी या नहीं। मामा भागकर टिकट खिडक़ी पर गए। वे टिकट लेकर लौटे तो सबकी जान में जान आयी।

सन्नी देओल के शिकंजे में 

सिनेमा हाल में प्रवेश करते समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जन्म जन्मांतर की मुराद पूरी हो रही हो। मन ही मन मैं सोच रहा था कि अब मैं दीदी को गर्व से बताऊंगा कि मैंने सिनेमाहाल में फिल्म देख ली। मन ही मन मैं मौसी और मामी को धन्यवाद कह रहा था। मैं पहली बार सिनेमाहाल में फिल्म देखने जा रहा था। हम आपके हैं कौन शुरू हुई। हम सब मजे से फिल्म देखने लगे। अचानक मुझे सिसकने की आवाज सुनायी दी। मैंने ध्यान से देखा तो पाया कि सब रो रहे थे। उस समय भाभी की मौत का दृश्य चल रहा था। मुझे रोना नहीं आया। हां, मुझे माधुरी और सलमान के बीच के दृश्य खूब भा रहे थे। फिल्म के अंतिम दृश्य में मुझे उस वक्त जरूर रोना आया था जब माधुरी की शादी मोहनीश बहल से होने जा रही थी। दरअसल, तब तक मैं खुद को प्रेम समझने लगा था। मुझे लग रहा था कि वह सब मेरे साथ हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि उस फिल्म की चर्चा अगले कुछ दिनों तक घर में लगातार होती रही। अम्मा दूसरे ही दिन दवाई का बहाना करके नानी के साथ दोबारा हम आपके हैं कौन देखकर आ गयीं। उसके बाद हर गर्मी की छुïट्टी में अम्मा हमें फिल्म दिखाने घोसी लेकर जाती थीं।

प्रियंका चोपड़ा ने जब अपने पति निक जोनस से मिलवाया 

'हम आपके हैं कौन' फिल्म ने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। अब मेरे अंदर हर फिल्म को देखने की चाह होने लगी, लेकिन अम्मा की इजाजत नहीं मिलती थी। शायद अम्मा के मन में अभी तक यह डर था कि फिल्में देखकर मैं बिगड़ जाऊंगा। अब चचेरे भाई बहनों के साथ मिलकर मैं चोरी-चोरी टीवी पर फिल्में देखने लगा। हम उस वक्त टीवी वाली कोठरी में चोरी से घुस जाते थे, जब दुआर पर कोई नहीं होता था। कभी-कभी पकड़े जाते तो डांट खानी पड़ती थी। उन दिनों वीसीआर का चलन था। किसी के यहां तिलक, शादी, गवना या अन्य कोई समारोह होता तो सभी बच्चों की मांग वीसीआर होती थी। ऐसे समारोहों में वीसीआर आने की खबर मिलते ही हम सब के बीच यह चर्चा शुरू हो जाती थी कि कौन-कौन सी फिल्में आ रही हैं। हम उस तारीख का बेसब्री से इंतजार करते थे। अफसोस की बात है कि मैं चर्चाओं में जरूर शामिल रहता था, लेकिन वीसीआर देखने कभी नहीं जा पाता था। मेरी अम्मा जाने ही नहीं देती थीं। दूसरे दिन मैं दोस्तों से उन फिल्मों की कहानी सुनकर अपनी प्यास बुझा लेता था। हां, हमारे घर के समारोह में वीसीआर लगता तो मैं जरूर फिल्म देखता था। अम्मा फिल्म देखने की इजाजत देने के साथ ही कह देती थीं कि एक फिल्म देखकर सोने आ जाना। दिसंबर की कडक़ती ठंड में हम सब रजाई लेकर पुआल पर बैठकर फिल्में देखा करते थे। 'राजा की आएगी बारात', 'तिरंगा', 'नागिन', 'नगीना', 'करण अर्जुन', 'शोला और शबनम', 'बोल राधा बोल, दूल्हे राजा, बीवी नंबर वन, कुली नंबर वन, राजा, बादल, राजा हिंदुस्तानी', 'मोहब्बतें', 'धडक़न', 'कुछ कुछ होता है' जैसी कई फिल्में मैंने सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे बैठकर देखी हैं।

पोज़र 

मैंने अपने शहर आजमगढ़ में आजतक मात्र एक फिल्म देखी है। उसमें भी धोखा हो गया। उस वक्त मैं कक्षा बारह में पढ़ रहा था। मैं दोस्तों के साथ अपने स्कूल के एक मास्टर जी के घर शादी में गया था। मास्टर जी ने लौटते समय हमें विदाई के तौर पर बीस-बीस रूपए दिए थे। दरअसल, वे हमसे बेहद खुश थे। हमने पूरी रात जागकर उनकी बेटी की शादी में काम किया था। वहां से लौटते समय हमने शहर के मुरली हाल में फिल्म देखने का फैसला किया। गोविंदा की फिल्म 'जंग' लगी थी। हम टिकट लेकर हाल में घुस गए। मन में डर भी था कि गांव या घर का कोई हमें देख न ले। हम बहुत बड़ा रिस्क ले रहे थे। जब फिल्म शुरू हुई तो पता चला कि वह पुरानी है। उसे हम दो बार टीवी पर देख चुके हैं। उसका वास्तविक नाम 'फर्ज की जंग' था। सिनेमाहाल वालों ने नाम बदल कर उसे लगाया था। हमें बड़ा गुस्सा आया। खैर, पंखा चल रहा था और हम सब रात भर के जगे थे, सो हम वहीं सो गए। फिल्म खत्म हुई तो किसी ने हमें जगाया और हम सिनेमाहाल वाले को गाली देते हुए घर चल पड़े। सारे दोस्त मुझे कोस रहे थे। मेरी वजह से उनका पंद्रह रूपया बर्बाद हो चुका था। आज भी हमारे शहर में नाम और पोस्टर बदलकर सिनेमाहाल वाले पुरानी फिल्में चलाते रहते हैं।

मुंबई के शुरूआती दिनों में 

मैं ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद आया। वहां सिनेमा से मेरी घनिष्ठता बढ़ी। शुरूआती दिनों में मैं इलाहाबाद के सिनेमाहाल में फिल्म देखने जाने से पहले घर पर अम्मा को फोन करके पूछता था। वे इजाजत देतीं, तभी मैं फिल्म देखने जाता। बाद में यह सिलसिला खत्म हो गया। शायद अब मैं बड़ा हो चुका था। इलाहाबाद में हमें महीने भर के खर्चे के लिए घर से गिनकर पैसे मिलते थे। प्रत्येक फिल्म हाल में देखना हम अफोर्ड नहीं कर सकते थे। सो, हम सभी दोस्त मिलकर पैसा इकट्ठा करते और हर दूसरे सप्ताह किराए पर सीडी लाते एवं बीते सप्ताह की नई फिल्मों की सीडी लाकर पूरी रात बैठकर देखते थे। यह सिलसिला तीन वर्ष तक अनवरत चलता रहा।

फिल्मफेयर समारोह की शाम 

गांव में रहते हुए मैंने एक भी अंग्रेजी फिल्म नहीं देखी थी। वहां अंग्रेजी फिल्मों का मतलब ब्लू फिल्में होती थीं। इलाहाबाद में मामा के बेटे ने जब मुझे सिनेमाहाल में अंग्रेजी फिल्म देखने के लिए कहा तो मैं चौंक गया। मैंने कहा कि मैं अंग्रेजी फिल्म नहीं देखूंगा, और तुमको भी नहीं देखनी चाहिए। वह फिल्में बुरी होती हैं। उसने पूछा, किसने कहा कि अंग्रेजी फिल्में बुरी होती हैं। तुम एक बार चलकर देखो, फिर मान जाओगे कि उन फिल्मों के सामने हिंदी फिल्में कुछ नहीं हैं। मैंने जब अपनी सोच बतायी तो वह हंसने लगा। मैंने पहली अंग्रेजी फिल्म 'द मम्मी रिटर्न' इलाहाबाद के चन्द्रलोक सिनेमाहाल में देखी।

दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान जब एक फ्रेम में आये तो हम मौजूद थे 

मैंने सपरिवार आखिरी फिल्म संजय दत्त की 'महानता' (वर्ष 1996) देखी थी। घोसी के विजय सिनेमाहाल में। आज मुंबई के मल्टीप्लेक्स में हर सप्ताह फिल्म देखता हूं, लेकिन यहां वह मजा नहीं मिलता, जो घोसी और इलाहाबाद में मिलता था। मैंने बचपन में कभी नहीं सोचा था कि एक दिन फिल्म इंडस्ट्री को करीब से देखने और जानने का मौका मिलेगा। मैं अब गांव जाता हूं तो एक बात मुझे हैरान करती है। गांव में कई औरतें ऐसी हैं जिन्होंने आजतक हाल में फिल्म देखी ही नहीं है। यह बात सोचने वाली है। मजे की बात यह है कि आजकल अम्मा सुबह नौ बजे या कभी देर रात फोन करके नाश्ते और डिनर के बारे में पूछती हैं और मैं कहता हूं कि अभी नहीं खाया है तो वे कहती हैं, सिनेमा के चक्कर में तुम बिगड़ गए। तुम्हारे कलकतिहवा बाबा सही कहते थे।

पसंदीदा फिल्में
1- आवारा
2- शोले
3- दीवाना
4- हम आपके हैं कौन
5- दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे
6- कुछ कुछ होता है
7- कभी खुशी कभी गम
8- हम दिल दे चुके सनम
9- कहो ना प्यार है
10- ओए लकी लकी ओए


रघुवेंद्र के दोनों हाथ जेब में रहते हैं और आँखें बात करते समय चमकती रहती हैं.उनके व्यक्तित्व की कोमलता आकर्षित करती है.वे फिल्मों को अपनी प्रेयसी मानते हैं और उसकी मोहब्बत में मुंबई आ चुके हैं.वे पत्रकारिता से जुड़े हैं और फ़िल्म इंडस्ट्री की मेल-मुलाकातों में उनका मन खूब रमता है.अपने बारे में वे लिखते हैं...राहुल सांकृत्यायन एवं कैफी आजमी जैसी महान साहित्यिक हस्तियों की जन्मभूमि आजमगढ़ में पैदाइश। आधुनिक शिक्षा के लिए अम्मा-पापा ने इलाहाबाद भेजा और हम वहां सिनेमा से प्रेम कर बैठे। वे चाहते थे कि हम आईएएस अधिकारी बनें, लेकिन अपनी प्रेयसी से मिलने की जुगत में हम फिल्म पत्रकारिता में आ गए। आजकल हम बहुत खुश हैं। अपनी प्रेयसी के करीब रहकर भला कौन खुश नहीं होगा? उनका पता है raghuvendra.s@gmail.com

नोट : यह संस्मरण वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज के लोकप्रिय ब्लॉग 'चवन्नी चैप' की हिंदी टॉकीज़ सीरीज़ के लिए मैंने कुछ वर्ष पूर्व लिखा था. 

Monday, May 18, 2020

    चौखट ही अब चरम है 

-रघुवेन्द्र सिंह 


चौखट ही अब चरम है 
तत्पश्चात सब भरम है.
जग जो आज ठहर गया 
यह तेरा-मेरा करम है. 

आ बैठ करें हिसाब ज़रा 
खोलें अपनी किताब ज़रा 
पन्ना क्यों सारा काला है 
अब कुछ ना मिटने वाला है 
तांडव जो मौत कर रही  
ये न मिटने वाला भरम है.  
चौखट ही अब चरम है 
तत्पश्चात सब भरम है.

कहता था तू बलवान है 
तुझको सबका ज्ञान है 
एक वायरस की दस्तक ने  
तेरा तोड़ दिया अभिमान है
यह मानव की कृति या कि प्रकृति 
कोई ना जाने क्या मरम है 
चौखट ही अब चरम है 
तत्पश्चात सब भरम है.

चौखट ही अब चरम है 
तत्पश्चात सब भरम है.
जग जो आज ठहर गया 
यह तेरा-मेरा करम है. 


Sunday, May 17, 2020

हम अब अपने गांव चले... 
-रघुवेन्द्र सिंह 


शहर मुबारक तुझको तेरा 
हम अब अपने गांव चले 
सर पर रख, जीवन की गठरी  
पैदल ही सरकार चले.


नन्हा मेरा, नग्न पाँव 
दो रोटी की धूप छाँव 
लम्बा रास्ता, ठौर न ठाँव
शिथिर हो गए मन के भाव 
सर पर रख, मौत की गठरी 
पैदल ही सरकार चले.


देश हमारा, कैसे माने?
जब भूख हमारी तू ना जाने 
सरकार हमारी, कैसे जाने?
जब पीर हमारी तू ना जाने 
सर पर रख, अभिमान की गठरी 
पैदल ही सरकार चले.


जीवित रहे, फिर मिलेंगे 
चुनाव में तो याद करोगे!
वोट माँगना, फिर हिसाब करेंगे 
पक्ष-विपक्ष की बात करेंगे! 
सर पर रख, यादों की गठरी 
पैदल ही सरकार चले. 


शहर मुबारक तुझको तेरा 
हम अब अपने गांव चले 
सर पर रख, जीवन की गठरी  
पैदल ही सरकार चले.

Saturday, May 16, 2020

याद रखिए कि सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए जो कदम आपने ऊपर की ओर बढ़ाए हैं, एक दिन उसी सीढ़ी से नीचे उतरना पड़ेगा। खुद के लिए वो समय मुश्किल ना बनाएँ।

तापसी पन्नू नयी पीढ़ी की एक सशक्त और सम्मानित अभिनेत्री हैं. अपनी बेबाक टिप्पणियों और अतुलनीय अभिनय के लिए लोकप्रिय हैं वो. सांड की आँख फिल्म के लिए इस वर्ष उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सिनेमाघरों के बाद उनकी फिल्म थप्पड़ इस वक्त डिजिटल प्लैटफॉर्म पर खूब देखी और सराही जा रही है. गैर-फ़िल्मी पृष्ठभूमि की तापसी उन तमाम लड़कियों के लिए एक प्रेरणा हैं, जो अपने बलबूते जीवन में कुछ कर गुज़रना चाहती हैं. ट्विट्टर की #रघुवार्ता में आज उनसे वर्तमान समय के सभी मुद्दों पर रोचक बातचीत हुई. उसे यहाँ संकलित करके प्रस्तुत कर रहे हैं. आप भी पढ़िए और उनकी सराहना कीजिये।


1. तापसी, घरेलू हिंसा के केसेज़ लॉकडाउन में तेज़ी से बढ़े हैं. महिलाओं की सहायता के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक विशेष व्हाट्सप्प नंबर- 7217735372 भी जारी किया है. एक महिला कैसे इस तरह की एक व्यक्तिगत आपदा से निपट सकती है?
हर महिला का अपना तरीक़ा होगा इससे लड़ने का। ज़रूरी ये है कि कुछ किया जाए। बस चुप करके बैठना हल नहीं है। जागरूक होना चाहिए, अपने प्रति, अपने पड़ोसी और मित्र के प्रति।

2. दो बड़ी फिल्में गुलाबो सिताबो और शकुंतला देवी सीधे डिजिटल प्लैटफॉर्म पर रिलीज़ हो रही हैं. खबर है जल्द कुछ और बड़ी फिल्में भी इसी तरीके से दर्शकों के बीच आएँगी. थियेटर मालिक निर्माताओं के इस फैसले से खासे नाराज़ हैं. उनकी यह नाराज़गी कितनी उचित है?
मुझे कोई हैरानी नहीं है कि वो नाराज़ हैं। उनका नाराज़ होना बनता है पर ज़रूरी देखना है कि समय का पहिया किस तरफ़ घूम रहा है। समय और हालात के बीच रास्ता निकालने वाला ही कामयाब कहलाता है।

3. क्या थियेटरों का भविष्य खतरे में है? क्या इस से स्टार सिस्टम में भी बदलाव आने की आशा है? 
मुझे पूरी उम्मीद और यक़ीन है कि भारत में थिएटर कभी ख़तरे में नहीं हो सकते। हमारी काफ़ी फ़िल्में बड़े परदे के लिए ही बनती हैं ओर सामूहिक देखते ही बनती हैं। पर हाँ अगर डिजिटल ने टिकटिंग सिस्टम चालू कर दिया तो स्टार सिस्टम में पक्का बदलाव आएगा।

4. व्यवसाय के हर क्षेत्र में इस समय सबकी सैलरी में कटौती हो रही है. क्या आप स्टार्स भी अपनी फीस में इस तरह की किसी कटौती का सामना कर रहे हैं या निकट भविष्य में कटौती होने के आसार हैं?
अभी तो क्यूँकि कोई शूट नहीं हो रही तो कोई सैलरी नहीं मिल रही। और तैयार हूँ कि आगे हमारी सैलरी में भी कटौती होगी।

5. इस लॉकडाउन की सबसे दुखद तस्वीर कौन सी होगी, जिसे आप पूरे जीवन में नहीं भूल पाएंगी?
बहुत सारी देखीं और बहुत मन ख़राब हुआ। अब एक गर्भवती महिला का कुछ सौ किमी चलना एक आदमी के अपनी माँ को कंधे पे उठा के चलने से कैसे कम या ज़्यादा होगा।

6. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आउटसाइडर और इनसाइडर के बीच फर्क की बात अक्सर होती रहती है. क्या इस तरह का कोई भेद अब भी है या यह सिर्फ एक मुद्दा भर है?
भेद है, था और हमेशा रहेगा। पर भेद हमेशा बुरा नहीं होता। एक तरफ़ इस भेद के चलते काफ़ी फ़िल्में हमें नहीं मिलती, पर शायद इसी भेद की वजह से जनता का ज़्यादा लगाव और ज़िन्दगी के असली अनुभवों को पर्दे पर उतारने का मौक़ा मिलता है।

7. प्रतिस्पर्धा से भरी इस इंडस्ट्री में अपना वजूद बनाये रखने और अनवरत सफलता की ओर बढ़ते रहने का आपका मूलमंत्र क्या है? 
कि याद रखिए कि सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए जो कदम आपने ऊपर की ओर बढ़ाए हैं, एक दिन उसी सीढ़ी से नीचे उतरना पड़ेगा। खुद के लिए वो समय मुश्किल ना बनाएँ।

8. आप घूमने की बेहद शौक़ीन हैं. आपके पास कई देशों की अनगिनत यादें होंगी, ज़ाहिर है अलग-अलग देशों में आपके मित्र भी होंगे. सबकी फिक्र तो होती होगी? आपके सभी दोस्त सुरक्षित तो हैं?
अभी तक सब कुशल मंगल।
🙏🏼
9. आपने कुछ दिन पहले यह कहकर बहुत से नौजवानों का दिल तोड़ दिया कि आपकी ज़िन्दगी में कोई 'खास' शख्स है. कह दीजिये कि वह एक मज़ाक था.
कमाल है। जब कोई नहीं होता तब सबको चिंता लगी रहती है कि क्यों नहीं है, अकेली कब तक रहेगी। और जब हो तो परेशानी कि क्यों है, बाक़ी नौजवानों का क्या होगा। क्या करूँ मैं ।।।????


10. पिछले महीने पीएम नरेंद्र मोदी ने एक टास्क दिया था और आपने उसका स्वागत करते हुए एक ट्वीट लिखा था- New task is here ! Yay yay yayy !!!. आपके इस ट्वीट का अर्थ यह निकाला गया कि आपने उनके द्वारा दिए गए टास्क का मज़ाक उड़ाया है. इस पर आपका क्या कहना है? आपको लगता है कि लोगों ने इसका गलत अर्थ निकाला?
कहा जाता है कि आपकी जैसी प्रवृत्ति होगी आपका नज़रिया और सोच वैसी ही होगी। मैंने तो ख़ुश होकर लिखा था, क्योंकि वो मेरी प्रवृत्ति है, बाक़ी सबने अपनी प्रवृत्ति के हिसाब से जो मन किया लिखा।

11. इस समय अगर आपको थप्पड़ मरना हो तो किसे मारेंगी? 
करोना को।
🤬

12. आपके मनमर्ज़ियाँ के को-स्टार विक्की कौशल का आज जन्मदिन है. उनके व्यक्तित्व की कौन सी बात आपको सबसे ज़्यादा आकर्षित करती है? इस लॉकडाउन में उन्हें कोई उपहार देना हो तो आप क्या देना पसंद करेंगी?
उपहार तो कभी सोचा नहीं पर हर साल उसके जन्मदिन पर ये ही उम्मीद करती हूँ कि काम में तरक़्क़ी की तरफ़ बढ़ते हुए उसके जीवन में बहुत बदलाव आएँ पर व्यक्तिगत तौर पर वो कभी ना बदलें क्यूँकि वही उसकी सबसे विशेष बात है।

13. फिलहाल क्या संकेत मिल रहे हैं? शूटिंग कब तक और कैसे होगी? न्यू नार्मल में क्या-क्या न्यू होगा फ़िल्म इंडस्ट्री में ?
मेरा मानना है कि नारमल वही रहेगा जो था, बस थोड़ा समय देना पड़ेगा। और शूटिंग का कोई पता नहीं कब होगी।

Thursday, May 14, 2020

अमिताभ बच्चन की जय-जय!  

महानायक की गुलाबो सिताबो बनी कोरोना महामारी के दौर में डिजिटल प्लैटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली पहली बड़ी फिल्म 

कोरोना के दुष्प्रभाव से व्यवसाय जगत चरमरा चुका है. अर्थव्यवस्था शैय्या पर धड़ाम करके बिखर चुकी है. इसकी चपेट में हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का दम भी घुट रहा है. सब कुछ ठहर सा गया है. फिल्में हों या सीरियल, वेब सीरीज़ हों या शार्ट फ़िल्में, सबका निर्माण लॉकडाउन के बाद से बंद है. थियेटरों के पट पर सिटकनी चढ़ी हुई है. चूँकि फिलहाल प्रोडक्शन की गाडी पटरी पर चढ़ती नहीं दिख रही है, इसलिए फिल्म उद्योग जगत की चिंताएं बढ़ गयी हैं. विकल्प तलाशने की कोशिश हो रही है. निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो फिल्में बनकर तैयार हैं, उन्हें कैसे दर्शकों तक पहुँचाया जाए. ज़्यादा समय तक उन्हें न रिलीज़ करने का तात्पर्य है अपने ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ाना. बीच में सुगबुगाहट हुई कि कुछ बड़े स्टार्स की फ़िल्में डिजिटल प्लैटफॉर्म पर सीधे दिखाई जाएंगी तो मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने सार्वजनिक रूप से निर्माता-निर्देशकों से सिफारिश की कि वो ऐसा न करें. लेकिन परदे के पीछे उन्होंने दबी जुबान में स्टार्स और मेकर्स को धमकी भी दे दी कि उन्होंने यदि ऐसा किया तो भविष्य में उनकी कोई भी फिल्म थियेटर में रिलीज़ नहीं होने दी जायेगी. उनकी इस धमकी का असर कितना हुआ, यह तो फिलहाल पता नहीं लेकिन आज सुबह-सुबह एक बड़ी खबर ने दस्तक दी. विक्की डोनर, पीकू और अक्टूबर जैसी बड़ी फिल्मों की लेखक जूही चतुर्वेदी और निर्देशक शूजित सरकार की अगली फिल्म, गुलाबो सिताबो, जिसमें अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना जैसे शीर्ष कलाकार मुख्य भूमिका में हैं, उसे १२ जून को अमेज़ॉन प्राइम पर रिलीज़ किया जा रहा है. खास बात यह है कि इसे दो सौ देशों में एक साथ दिखाया जायेगा, जो किसी भी कलाकार और मेकर के लिए एक बड़ी बात है. 

गौर करने वाली बात यह है कि डिजिटल प्लैटफॉर्म का रुख करने वाले स्टार्स में अक्षय कुमार का नाम सबसे पहले उभरकर आया था. खबरें थी कि उनकी फिल्म लक्ष्मी बॉम्ब इस दिशा में पहला बड़ा कदम होगी। विद्या बालन की शकुंतला देवी, जान्हवी कपूर की गुंजन सक्सेना, कृति सैनन की मिमी, अभिषेक बच्चन और राजकुमार राव की लूडो, राधिका मैदान की शिद्दत फिल्मों के निर्माता भी इस नयी दिशा में बढ़ने का विचार कर रहे थे. लेकिन फिलहाल परिवर्तन की इस बयार में बाज़ी बिग बी ने मार ली है. फिल्म इंडस्ट्री में इक्यावन साल का सफर तय कर चुके अमिताभ बच्चन परदे पर हमेशा हमारे नायक रहे हैं लेकिन इस मुश्किल परिस्थिति में भी वह नायक बनकर उभरे हैं. उन्होंने और उनकी गुलाबो सिताबो फिल्म की टीम ने थियेटर मालिकों को ठेंगा दिखा दिया है और एक डिजिटल प्लैटफॉर्म पर अपनी फिल्म को प्रदर्शित करने के समय की मांग को समझते हुए एक साहसिक फैसला किया है. जिसका स्वागत होना आवश्यक है. अक्षय कुमार की सूर्यवंशी और रणवीर सिंह की ८३ थियेटर खुलने की प्रतीक्षा में फिलवक्त रुकी हैं.  इतना ही नहीं, जहाँ दूसरे स्टार्स हाथ पर हाथ धरे अपने घरों में बैठे हैं और स्थिति के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीँ अमिताभ बच्चन ने अपने घर से काम शुरू कर दिया है. आप सबने उनके लोकप्रिय गेम शो कौन बनेगा करोड़पति के नए सीज़न का प्रोमो अपने टीवी और सोशल मीडिया पर अवश्य देखा होगा. यह प्रोमो उन्होंने अपने घर में शूट किया है और जल्द ही, अपने इस गेम शो के साथ वह दर्शकों के बीच हाज़िर होंगे. कमाल है उनका अपने काम के प्रति समर्पण!  
फिल्म बिरादरी के विशेषज्ञों की माने तो कोरोना महामारी ने न सिर्फ हमारी जीवन शैली बदली है, बल्कि इसने हमारे मनोरंजन के माध्यम भी बदल दिए हैं. इस महामारी में डिजिटल प्लैटफॉर्म हमारे मनोरंजन की खुराक पूरा करने का सबसे सशक्त माध्यम बन कर उभरे हैं. थियेटर तो बंद हैं ही, टीवी भी इस समय बासी पड़ गए हैं. ऐसे में, डिजिटल प्लैटफॉर्म पर अपने घर में बैठे-बैठे हम दुनिया के तमाम देशों में निर्मित फ़िल्में और वेब सीरीज़ का आनंद लेने के आदी बन बैठे हैं. कुछ दिनों में हम जरुरतवश अपने अपने काम पर तो लौट जाएंगे लेकिन क्या हम मनोरंजन के लिए थियेटर में लौटेंगे, यह एक बड़ा सवाल है. 

#रघुवार्ता 

Tuesday, May 12, 2020

लॉकडाउन खुलने के बाद मैं जब भी माधुरी दीक्षित से मिलूंगा तो उन्होंने मास्क पहना होगा और अब मुझे उनकी वो प्यारी-सी स्माइल देखने को नहीं मिलेगी...

#रघुवार्ता के अंतर्गत आज हिंदुस्तान के सर्वाधिक लोकप्रिय होस्ट, अभिनेता और निर्माता मनीष पॉल, जो अपनी हाज़िरजवाबी के लिए जाने जाते हैं, से ट्विटर पर रोचक बातचीत हुई. कोरोना महामारी के इस संकट के दौर में वह आपने आस-पास लोगों की हर संभव सहायता करने में जुटे हुए हैं. उन्होंने पीएम केयर्स फंड में एक बड़ी राशि दान भी की है. इस लॉकडाउन में अपने परिवार के संग समय बिताने के साथ-साथ वह लगातार काम भी कर रहे हैं. मदर्स डे पर उन्होंने एक म्यूज़िक वीडियो रिलीज़ किया था और अब वो एक शॉर्ट फिल्म What If लेकर आ रहे हैं. इसका निर्माण उन्होंने खुद किया है और जियो स्टूडियो के साथ मिलकर इसे रिलीज़ कर रहे हैं. आशा है आप सबको इस बातचीत को पढ़ने में आनंद मिलेगा... 


आम तौर पर काम के सिलसिले में आप बाहर ही रहे हैं, लेकिन फिलहाल पचास दिनों से बीवी और बच्चों के साथ घर में बंद हैं. वो आप से परेशान तो नहीं हो गए हैं?
हाँ यार, आम तौर पर मैं बिज़ी रहता हूँ लेकिन इतने समय बाद घरवालों के साथ रहकर ये पता चला कि ये तो वाकई अच्छे लोग हैं, मज़ा आ रहा हैं इनके साथ. परेशान हैं या नहीं, पता नहीं. बेटा युवान छोटा है, कुछ कुछ बोलता रहता है. अब समझ नहीं आ रहा कि खुश है या परेशान. लेकिन हाँ, मज़ा आ रहा है.

मैंने देखा है कि वॉचमैन हो या हाउस हेल्प, पड़ोसी हों या मित्र, आप सबका ध्यान इस लॉकडाउन में रख रहे हैं. क्या आपकी खैरियत पूछने भी कोई आया?
जितना मुझसे बन पड़ता है, मैं सबकी मदद करने की कोशिश करता हूँ. मैंने नोटिस किया है कि इस समय पराये भी अपने हो गए हैं. यह मुंबई की खासियत है कि जब भी कोई मुसीबत आन पड़ती है तो सब एकजुट हो जाते हैं. आजकल कोई यह बता दे कि बिल्डिंग में अंडे-ब्रेड वाला आया है तो वो भी एक बड़ी मदद है.
आपने देश की कोरोना से लड़ाई के लिए पीएम केयर्स फंड में डोनेट भी किया है. इस महामारी से निपटने के लिए जिस तरह फिल्म, टीवी, खेल और बिज़नेस जगत एवं आम जनता ने आगे बढ़कर दान दिया है, वह प्रशंसनीय है... 
मेरा हंसी-मज़ाक सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं हैं,मेरा रिश्ता मेरे दर्शकों के साथ उससे परे भी है.उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया है.आज इस मुकाम तक पहुँचाया है. मैं हर संभव तरीके से लोगों के काम आने की कोशिश कर रहा हूँ. इस समय हम एक-दूसरे के लिए खड़े होंगे तो ही इस महामारी से लड़ पाएंगे.

आज कल आप कम्पाउंड में वॉक करते नहीं दिखते, हालाँकि लोग बेधड़क सुबह-शाम खूब वॉक कर रहे हैं...
मैं हेल्थ का बहुत ध्यान रखता हूँ. लेकिन मैं कम्पाउंड में आज कल नहीं आता. बल्कि अगर ज़रूरी सामान न लाना हो तो मैं दरवाज़े से बाहर निकलता ही नहीं. इस समय हेल्दी रहने के लिए, सेहत का ख्याल रखने के लिये, अपने घर, अपने कमरे से सुरक्षित और स्वच्छ जगह कोई नहीं है.

अगर मौका मिलता तो किस एक्ट्रेस के साथ आप लॉकडाउन होना पसंद करते? और विकल्प में सलमान खान का फार्म हाउस भी हो तो?
मैं जेनिफर लोपेज़ के साथ लॉकडाउन में रहना चाहूंगा क्यूंकि वो जो बोलेंगी मुझे समझ में नहीं आएगा, मेरी पंजाबी उनको समझ में नहीं आएगी और ऐसे ही लॉकडाउन गुज़र जाएगा। वैसे, सलमान सर का फार्म हाउस भी अच्छा है क्यूंकि वहां घोड़ों का बहुत ध्यान रखा जा रहा है और घोड़ों को कभी सलमान सर के सिर तो कभी कन्धों से चारा खाने को मिल रहा है. सोच रहे होंगे कि मैं घोड़ों की बात क्यों कर रहा हूँ क्यूंकि किसी ने कहा था कि मनीष तुम बड़ी लम्बी रेस के घोड़े हो.
कहा जा रहा है कि कोरोना की उत्पत्ति चीन में हुई है. विश्व के तमाम देश चीन से खार खाये बैठे हैं. क्या विरोध में अब आप चाइनीज़ खाना बंद कर देंगे?
देखिये, विरोध तो क्या ही करना है. हाँ, मैं सारा चाइनीज़ खा जाऊंगा. मैं सोच रहा हूँ कि विरोध में मैं एक चाइनीज़ रेस्टोरेंट खोलूं और उसमें पंजाबी तड़के के साथ चाइनीज़ बनाऊं- मंचूरियन मखनी, नूडल दो प्याज़ा, टिंडे का मनचाउ सूप और चाइना वालों से बोलूं कि अब यह करके दिखाओ.

अगर इस वक्त आपको प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलता तो आप क्या करते? कोरोना से कैसे निपटते?
मुझे नहीं लगता कि इस समय कोई भी यह ज़िम्मेदारी निभा सकता है. हमारा वोट बहुत सही जगह गया है. हम पीएम नरेंद्र मोदी जी का सिर्फ किरदार निभाने की कल्पना कर सकते हैं. वो जिस तरीके से एक सौ तीस करोड़ लोगों की आबादी को संभाल रहे हैं,उनसे बेहतर यह कोई नहीं कर सकता. मेरा सैल्यूट है उनको.
होस्टिंग के दौरान सबके साथ घुलना-मिलना और मस्ती करना आम बात थी. आपका माधुरी दीक्षित के साथ 'पल्लू प्रेम' सबको याद है. अब टीवी पर कैसे क्रिएट करेंगे ऐसे यादगार मोमेंट्स?मैं माधुरी दीक्षित जी को बहुत मिस कर रहा हूँ. लेकिन मुझे एक बात की टेंशन है कि लॉकडाउन खुलने के बाद मैं जब भी उनसे मिलूंगा तो उन्होंने मास्क पहना होगा और मुझे उनकी वो प्यारी-सी स्माइल देखने को नहीं मिलेगी. और अगर उन्होंने गलती से भी 'उह-उह' कर दिया तो मैं भाग खड़ा होऊंगा.
लॉकडाउन का सबसे अच्छा इस्तेमाल बॉलीवुड का कौन सा शख्स कर रहा है?
लॉक डाउन का सबसे अच्छा इस्तेमाल मेरे आइडल मिस्टर अमिताभ बच्चन कर रहे हैं. घर में रहने के बावजूद, लॉकडाउन का पालन करते हुए उन्होंने केबीसी का प्रोमो शूट किया. उन्होंने यह दिखा दिया कि कुछ भी हो जाए एंटरटेनमेंट नहीं रुकना चाहिए. एक एंटरटेनर का काम है एंटरटेनमेंट क्रिएट करना और लोगों तक पहुँचाना, परिस्थिति चाहे कुछ भी हो. सैल्यूट करता हूँ उन्हें. वैसे, मैं भी लगातार काम कर रहा हूँ. कल मेरी शार्ट फिल्म #WhatIf रिलीज़ हो रही है. 
इस वक्त सब किचन किंग हो गए हैं. क्या आप भी यह दावा कर सकते हैं?
मैंने देखा है कि आजकल हर स्टार किचन में खाना बना रहा है, बर्तन धो रहा है... नहीं-नहीं, मैं यह सब नहीं करता. मेरी वाइफ करती हैं. अरे वो आज भी बहुत डरती हैं मुझसे, मैं एक आवाज़ देता हूँ तो वो मेरे लिए गरम पानी लेकर आ जाती हैं. दरअसल, मैं ठन्डे पानी से बरतन नहीं धो पाता।












Monday, May 11, 2020

मदर्स दे स्पेशल !
अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
-रघुवेन्द्र सिंह  

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?

अपनी परवाह न करती हो, 
हम सबकी परवाह में मरती हो.

तुम खुद खाओ खाना या ना,
पर सबकी फ़िक्र में रहती हो.            

हम देर रात घर भी आएं, 
तुम जागी ही मिलती हो.

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?

सुबह, दोपहर, शाम, रात, 
सब एक किये रहती हो.               

हम भले हार-थक जाएँ, 
पर तुम न कभी थकती हो.

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?

हम खीझ भले ही जाएँ, 
पर तुम हंसती रहती हो.                      

हम दूर चले भी जाएँ, 
पर तुम पास सदा रहती हो. 

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?

अब अपना रखो ख्याल ज़रा, 
यही हमारी विनती है.

तुम हो तो जहाँ में सब कुछ है, 
तुम से ही हमारी गिनती है. 

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?

तुम और किसी को न मिलना,  
हर रोज़ इबादत करते हैं.       

हर जनम मिलो, तुम ही हमको, 
बस यही हिमाकत करते हैं. 

अम्मा, तुम ऐसी क्यों हो? 
तुम, खुद जैसी क्यों हो?