Friday, August 30, 2013

मैं शातिर बिजनेसमैन नहीं हूं: इरफान

इरफान जितने गंभीर दिखते हैं, उतने हैं नहीं. एक मुलाकात में रघुवेन्द्र सिंह ने उनके व्यक्तित्व, जीवन एवं सफर के रोचक पहलुओं को जाना
बीता साल इरफान के नाम रहा. पान सिंह तोमर (हिंदी) और लाइफ ऑफ पाय (अंग्रेजी) फिल्मों के जरिए उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहना बटोरी. पान सिंह तोमर के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड हासिल किया. अभिनय के मामले में उन्होंने ऐसा स्तर कायम कर लिया है, जिसकी अब मिसाल दी जाती है. यह बात अब स्वयं इस धुरंधर कलाकार के लिए चुनौती बन चुकी है. इसीलिए उनके अंदर के अभिनेता की भूख और बढ़ गई है. वह नित कुछ नया तलाश रहे हैं.
पंद्रह साल के अभिनय करियर में इरफान निरंतर आगे बढ़ते रहे हैं. जयपुर के खजुरिया गांव (टोंक जिला) के इस शख्स की यात्रा तिरस्कार, संघर्ष और पुरस्कार से भरी रही है. लेकिन उनमें कड़वाहट नहीं आई है. बल्कि ïअवसर और स्थान देने के लिए वह इंडस्ट्री के आभारी हैं. लेकिन उन्हें एक बात का अफसोस है. ''मैंने बचपन में ऊपर वाले से एक गलत दुआ मांग ली थी. मैंने कहा कि मुझे एक अच्छा अभिनेता बना दे, लेकिन मैंने पैसा नहीं मांगा. अब एक्टिंग तो मुझे आ गई, लेकिन पैसा नहीं मिल रहा है. कहकर इरफान जोर का ठहाका लगाते हैं. पढि़ए इरफान से यह रोचक बातचीत...

हमने सुना है कि आजकल आप काफी कुछ नया कर रहे हैं. सिंगिंग सीख रहे हैं. अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू कर रहे हैं.
मैं सिंगिंग पर काफी अरसे से काम कर रहा हूं. मैं चाहता हूं कि म्यूजिक के ऊपर कोई कहानी बनाए और मेरे पास लाए. बीच में विशाल भारद्वाज एक फिल्म बना रहे थे. माहौल बन रहा है म्यूजिक पर आधारित कुछ फिल्मों का. कुछ कहानियां होती हैं, जिन्हें आपको लगता है कि कन्वेंशल प्रोड्यूसर पहचान पाएगा, लेकिन आपको पता है कि ये फिल्में वर्क करेंगी, तो आप उस फिल्म को सपोर्ट करते हो. लंचबॉक्स में मैं पार्ट प्रोड्यूसर हूं. मैं निशिकांत कामथ के साथ एक फिल्म बनाने जा रहा हूं. मैं कुछ नया करने की कोशिश कर रहा हूं.

आप जैसे एक स्थापित कलाकार को अपने स्तर को ध्यान में रखते हुए कुछ नया तलाशना एक चुनौती होगी?
यार, नया नहीं लाऊंगा, तो मेरा खुद को इंट्रेस्ट उसमें कैसे रहेगा? यह चैलेंज तो है. इस जॉब का नेचर ही ऐसा है. यह रेगुलर जॉब तो नहीं हो सकती कि पांच फिल्म कर ली और फिर फुरसत ले ली. मैंने उस तरह की लाइफ नहीं चुनी. इस जॉब की मांग है नया होना. इसका लेना-देना लोगों के दिलो-दिमाग को इंगेज करने से है.

आजकल क्षेत्रीय सिनेमा में काफी नई कहानियां निकल कर आ रही हैं. आप क्षेत्रीय फिल्मों में काम नहीं करना चाहते?
मैं खुद उस तरफ कुछ नहीं ढूंढ रहा हूं. अगर कुछ इंट्रेस्टिंग आएगा, तो जरूर करूंगा. मैंने अब लोगों को अप्रोच करना बंद कर दिया. अब मैं समझ गया हूं कि जो मेरे पास है, मैं उसके साथ इंसाफ करुंगा. यह टाइम बहुत अच्छा है. केवल मैं ही नया नहीं कर रहा हूं, बल्कि पूरी इंडस्ट्री नया कर रही है. नए डायरेक्टर आ रहे हैं, नई कहानियां आ रही हैं, नए प्रोड्यूसर आ रहे हैं. यह ट्रान्जिशन का टाइम है.

आपने लोगों को अप्रोच करना क्यों बंद कर दिया?
अप्रोच करने से मेरी जिंदगी में कुछ हुआ नहीं. जब मैं इंडस्ट्री में नया-नया आया था, तो खूब घूमता था. फोटोग्राफ्स लेकर दफ्तरों में जाता था. लेकिन उल्टा हो जाता था. जिन लोगों ने मेरा काम देखा होता था, वो मुझे देखते थे, तो पता नहीं क्यों उल्टा हो जाता था. मैं बात करने में ईजी नहीं हूं. आप किसी इंसान से पहली बार मिलें और चुप रहें, तो माहौल अनकंर्फटेबल हो जाता है. यह मेरी कमजोरी है. जो पॉइंट है, मैं उसी पर बात कर सकता हूं. मुझे महसूस हुआ कि मुझे ये करने की जरूरत नहीं है. शायद मुझे थोड़ा सब्र रखना पड़े.

उस समय कभी आपको ह्यूमिलिएशन से गुजरना पड़ा?
बहुत बार. मैं उस सीरियल का नाम नहीं लेना चाहता. उसमें हम कभी-कभी रोल करते थे. फिल्मसिटी में शूटिंग होती थी. जो लोग खाना देते थे, वो बहुत प्यार से खाना नहीं खिलाते थे. कई बार शॉट के समय तकनीशियन, कैमरामैन कुछ भी बोल देते थे. और किसी भी क्रिएशन के समय आदमी थोड़ा सा वूनरेबल हो जाता है. तो उसे लग रहा होता है कि वह नंगा हो रहा होता है सबके सामने. उस समय अपने तरह का एक कमेंट आपको बहुत चुभ सकता है. 

आप उन बातों को दिल पर लेते थे?
हां, सीधे दिल पर लगती थीं वो बातें. किसी ने पैसे नहीं दिए, यह कहकर कि आपका काम इस लायक है ही नहीं. शुरू-शुरू में मैं एक सीरियल कर रहा था. मैं एनएसडी में सेकेंड ईयर में था. छुट्टियों में हम काम कर लेते थे. उस समय हमारे लिए 350 रूपए बहुत होते थे. मेरा एक एंट्री सीन था. पता नहीं क्या हुआ. दो-तीन बार एक्टर के साथ हमारा को-ऑर्डिनेशन गड़बड़ हो गया. तो उस एक्टर ने चिल्लाया कि पता नहीं कहां से लोगों को पकड़ लाते हो.

पहले लोग यह कहकर आपका पैसा काट लेते थे कि काम उतना अच्छा नहीं है. आज आपको पता है कि आपका काम किस स्तर का है, तो क्या आप उस हिसाब से पैसा चार्ज करते हैं?
मैंने कभी अपने आपको ओवरकोट नहीं किया. मैंने हमेशा कम या फिर वाजिब पैसा मांगा. क्योंकि मुझे पता है कि मेरी फिल्मों का क्या रिएक्शन है या क्या आमदनी मिल सकती है. मैं शातिर बिजनेसमैन नहीं हूं. मुझे पता नहीं है कि अपने आपको कैसे ओवर प्राइस करना है. मैं वह जरूर सीखना चाहूंगा.

आजकल अनेक सेलिब्रिटी मैनेजमेंट कंपनियां हैं, जो एक्टर को ब्रांड बनाकर बाजार में बेहतर तरीके से बेच रही हैं. आप उनसे क्यों नहीं जुड़ते?
वो कंपनियां ब्रांड वैल्यू बढ़ाकर अपना उल्लू सीधा कर रही हैं. मेरी जानकारी में ऐसी कोई कंपनी नहीं है, जो किसी कलाकार के पास काम लेकर आई है. मुझे नहीं लगता है कि आपकी जो वैल्यू है, उससे बड़ा आपको कोई बना सकता है. अगर कोई ऐसा कर सकता है, तो मैं जरूर उससे जुडऩा चाहूंगा. मैं अपने आप में एक ब्रांड हूं. अगर कोई कंपनी आकर कहती है कि वह मुझे बेहतर ब्रांड बना सकती है, तो मैं जरूर उससे जुडऩा चाहूंगा.

कमर्शियल सिनेमा में खुद को कहां पाते हैं?
मैं कमर्शियल सिनेमा की परिभाषा को थोड़ा-सा हिचकोले देने के लिए आया हूं. हमारे यहां कमर्शियल सिनेमा की परिभाषा सीमित है. यह थोड़ी सी विस्तृत होनी चाहिए. मैं जो फिल्में करूंगा, मेरी कोशिश होगी कि वह ढर्रे की भी न हों और कमर्शियल भी हों. हमें ऐसा सिनेमा गढऩे की जरूरत नहीं है, जो कमर्शियल के खिलाफ खड़ा हो जाए. कमर्शियल सिनेमा में वेरायटी लाने की जररूत है. यह बात मैंने दस साल पहले भी सोची थी, लेकिन तब यह मुमकिन नहीं था. जब मैं लोगों से बोलता था, तो लोगों को ये बात अजीब लगती थी. एरोगेंस लगता था.

आपने गुनाह, फुटपाथ, चरस, चेहरा आदि फिल्में कीं. क्या ये फिल्में आपने कमर्शियल कारणों से की थीं?
हां, मैंने कमर्शियल वायबिलिटी ढूंढऩे के लिए की थीं. मैं तलाश रहा था कि मैं इनमें कहां फिट होता हूं. इन फिल्मों की वजह से क्या मेरा प्राइस बढ़ता है? क्या मैं प्रोड्यूसर के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होता हूं? उससे अच्छी बात यह हुई कि वो फिल्में बंपर हिट नहीं हुईं. अगर हो जातीं (हंसते हैं), तो लगता तो नहीं है, लेकिन शायद मैं फंस गया होता. मुझे कभी-कभी लगता है कि जो सुप्रीम पावर है, उसके पास आपके लिए ऑलरेडी एक डिजाइन है. वो हमेशा आपको धक्का देकर सही रास्ते पर डालता रहता है. उन फिल्मों के कुछ अनुभव हैं, जिनसे मुझे एक एक्टर के तौर पर ग्रो होने में मदद मिली. उनमें से बहुत-सी फिल्में ऐसी थीं, जिनकी कहानी से मैं कंवेंस नहीं था. उस वक्त मैं अपनी प्रजेंस दिखा या जता रहा था, तो मैं उन फिल्मों में कोशिश करता था कि कहानी पर ध्यान न जाए, मैं अपनी बाजीगरी दिखाऊं. 

क्या आपने तय कर लिया है कि उस गली में दोबारा नहीं जाएंगे?
ऐसी फिल्मों को करने की मेरी जरूरत नहीं है और न ही मेरी मजबूरी है. अब मेरे लिए उसमें कुछ नया नहीं है. आपको ढूंढना पड़ता है कि क्या चीज आपको मजा देती है. कहते हैं कि आपके विश सोच-समझकर मांगनी चाहिए, कहीं गलत दुआ कबूल हो गई, तो गड़बड़ हो जाती है.

आपने कभी गलत दुआ मांगी और वह कबूल हो गई?
हां यार, मांगी थी. मैं बचपन में दुआ मांगता था कि बहुत खतरनाक एक्टर बन जाऊं और पैसा मैं नहीं मांगता था. मुझे लगता था कि ऊपर वाले से अब पैसा क्या मांगना. मैंने सोचा कि एक्टर तो वही बना सकता है, पैसा तो मैं कमा ही लूंगा. पता चला कि एक्टिंग तो आ गई, लेकिन पैसा नहीं मिल रहा है (हंसते हैं). अब लगता है कि उस समय पैसा भी मांग लेना चाहिए था.

माना जाता है कि आपका किरदार की तैयारी करने का अंदाज अलग है. उस बारे में बता सकते हैं?
मैंने जब एक्टिंग शुरू की थी, तब मेरे मन में यही था कि लोग मुझे नोटिस करें कि मैं जैसा दिखता हूं, वैसा नहीं हूं, मेरे अंदर भी बहुत कुछ है. मुझे नहीं पता था कि एक्टिंग फेम, पैसे का माध्यम है. मुझे ये नहीं पता था कि एक्टिंग मेरे लिए ऐसी चीज बन जाएगी, जिसके जरिए मैं अपने जीवन को एक्सप्लोर करूंगा. ये एक प्रॉसेस हुआ है. लाल घास पर नीले घोड़े जब मैं कर रहा था, तब मुझे पता नहीं था कि मैं कैसे कैरेक्टर को अप्रोच करूंगा. पान सिंह तोमर कर रहा था, तब मैं एक्टर के तौर पर तैयार हो चुका था. अगर मेरे पास कोई स्क्रिप्ट आई है, तो मेरे पास क्राफ्ट है. तब क्राफ्ट नहीं था. धीरे-धीरे मुझे रियलाइज हुआ कि यह मेरी जिंदगी से अलग नहीं है, यह मेरी जिंदगी ही है. जिंदगी और मेरा धंधा एक ही है. मेरे कैरेक्टर मेरी खुराक हैं. अगर मैंने डी-डे की, तो उसका कारण यह था कि मैंने कभी इंटेलीजेंस ऑफिसर का रोल नहीं किया था. अप्रोच वही है कि जिंदगी से कनेक्ट होना चाहिए. वही आपका पर्सनल अफर्ट है.

निखिल आडवाणी की पिछली फिल्में (सलाम-ए-इश्क, चांदनी चौक टू चाइना, पटियाला हाउस ) नहीं चली थीं, तो जब वो आपको पास डी-डे लेकर आए, तो मन में कोई सुबहा था?
हां, जरूर था कि ये फिल्म वैसी ही कुछ होगी. लेकिन जब उसने कहानी सुनाई तो मैं चौंक गया. उसने बताया कि उसका ओरिएंटेशन ऐसी ही फिल्मों का है. हालांकि मुझे इस बात का विश्वास नहीं हुआ. धीरे-धीरे डिस्कशन में मुझे विश्वास होने लगा. हर क्रिएटिव आदमी को अपने आप को चैलेंज करना जरूरी होता है.

तिग्मांशु धूलिया के साथ आपने कमाल की फिल्में दी हैं. उनका आपके करियर में काफी योगदान है.
मेरा उसके और उसका मेरे करियर में खास योगदान रहा है. मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अपने आपको जिस ओर बढ़ा रहा था, वो भी उसी तरह से किसी दूसरे शहर से आया था. हमारी और उसकी सेंसिबिलिटी मिलने लगी. वैसे तो हम दोस्त के तौर पर बातें करते थे, लेकिन जब उसने मेरे प्ले देखे और जिस तरीके से रिएक्ट किया, तब मुझे लगा कि जो मेरे अंदर महसूस हो रहा था, वो उस तक पहुंचा. वहां से एक अजीब सी बॉन्डिंग हुई. आप कोई क्रिएशन करते हैं और वह सीधे किसी इंसान तक पहुंचती है, तो आपके लिए वह शख्स खास बन जाता है.

लेकिन अभी आप दोनों अलग-अलग रास्ते पर चल रहे हैं?
अभी उसका टाइम आ गया है. वह जैसा सिनेमा बनाने का इच्छुक है, अब लाइफ उसे मौका दे रही है. हासिल और पान सिंह तोमर उसी का सिनेमा था, लेकिन वह बहुत लिमिटेशन में बना रहा था. आज उसको पूरे साधन मिलेंगे. अगर वो सारी फिल्में मेरे साथ बनाएगा, तो वो भी बोर हो जाएगा, मैं भी. मैं जिस दिन उतने करोड़ का एक्टर हो जाऊंगा, तो फिर उसके सिनेमा में आ जाऊंगा. अपनी एक दुनिया है यार, जिसमें बहुत-सी चीजें काम करती हैं. 

तिग्मांशु कभी स्टार के पीछे नहीं भागे, लेकिन अब वह स्टार के साथ चल रहे हैं.
क्योंकि स्टार पहले जानते नहीं थे कि तिग्मांशु धूलिया क्या थे. आज उसको मौका मिल रहा है, तो वह स्टार के साथ फिल्म क्यों न बनाए? वो स्टार के पीछे नहीं जा रहा है, स्टार उसके पीछे आ रहे हैं. स्टार पैसा लेकर आ रहा है. आपको जो फीस मिलती है, उसकी पांच गुना ज्यादा अब मिलेगी.

आप भारतीय और विदेशी फिल्मकारों के साथ काम करने का जो अनुभव बटोर रहे हैं, उसका इस्तेमाल कभी करेंगे?
अगर मुझे एक राइटर मिल जाए, तो मैं एक्टिंग छोडक़र डायरेक्शन में लग जाऊं. यह डायरेक्टर्स का टाइम है. लोग अच्छा सिनेमा देखने के लिए आतुर हैं. लेकिन मैं राइटर नहीं हूं. मेरे अंदर लिखने की क्षमता नहीं है. अगर मुझे राइटर मिलेगा, तो मैं जरूर डायरेक्टर बनूंगा.

आपकी पत्नी सुतपा एक अच्छी राइटर हैं.
क्या है कि या तो तुम अपना घर चला सकते हो या काम कर सकते हो. दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकतीं. फिर या तो घर रहेगा या कहानी. हम दोनों दोस्त अच्छे हैं. शायद थोड़ा अच्छे पति-पत्नी भी हो सकते हैं. एक सहकर्मी के तौर पर अच्छे नहीं है. वो मेरे लिए बहुत अधीर हैं और मैं उनके लिए बहुत हार्ड होऊंगा. मैं जल्दी संतुष्ट नहीं होता. हम सहकर्मी के तौर पर एक नहीं हो सकते.

आप दो बच्चों बाबिल (12 वर्ष) और अयान (8 साल) के पिता हैं. आप उनके संग सख्ती से पेश आते हैं या एक दोस्त की तरह?
मैं चाहूंगा कि मेरे जैसा पिता सबको मिले. मैंने अपने बच्चों के साथ कभी जबरदस्ती नहीं की. हां, मैंने उनको आगाह किया है. कभी कोई चीज थोपता नहीं. खाने को लेकर कभी-कभी इंपोज किया है. जैसे मैं फास्ट फूड खाने से टोकता हूं. कोल्ड ड्रिंक पीने से रोकता हूं. मैं उनका दोस्त ज्यादा हूं. मेरे लिए लाइफ का सबसे प्योर एक्सपिरिएंस पिता बनना है. दुनिया में बहुत कम अनुभव हैं जो इतने प्योर हैं. पिता बनने के बाद आपको देने की आदत हो जाती है.

कभी आपने कोई फिल्म आपने ठुकराई और बाद में उसे ना कहने का पछतावा हुआ?

दबंग और स्पेशल 26 मेरे पास आई थीं, लेकिन जब इन फिल्मों में मैं था, तब ये मेरे हिसाब से अडॉप्ट करने के लिए तैयार नहीं थीं. लेकिन जब वो वहां गईं, तो फ्लेक्सिबल हो गईं. तो मैं ये नहीं कह सकता कि दबंग में मैं होता, तो वो ऐसी होती.

क्या सच है कि खान के संग तुलना होने की वजह से आपने अपना सरनेम खान हटा दिया?
मैं तुलना से तंग आ चुका था. मैं तुलना नहीं करता. मैं जो करता हूं, वह रीयल और दूसरे लोग जो करते हैं, वह भी सही हैं. वो किसी फ्लूक पर सरवाइव नहीं कर रहे हैं. वो कड़ी मेहनत कर रहे हैं. उनका अपना चार्म है, जो लोगों पर काम करता है. हां, कुछ एक्टर्स जरूर हैं, जो जबरदस्ती थोपे हुए हैं दर्शकों के ऊपर और वो सरवाइव कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास सपोर्ट है. वह अलग बात है.

आपको लगता है कि इंडस्ट्री ने आपको ड्यू नहीं दिया?
मैं कभी ऐसा नहीं सोचता. मैं इस मामले में बहुत पॉजिटिव हूं. इस इंडस्ट्री ने मुझे बहुत कुछ दिया. हासिल के बाद मेरे पास रोज दो स्क्रिप्ट आती थीं. लेकिन मैंने फिल्में नहीं कीं, क्योंकि मैं खुद अपनी अलग जगह बनाना चाहता था. इंडस्ट्री तो खुले हाथों मेरा स्वागत करने के लिए तैयार थी. मैं बोल रहा था कि मैं नहीं करना चाहता. वह मेरी प्रॉब्लम थी.

आपको थिंकिंग वूमन सेक्स आइकॉन कहा जाता है. आप इसे पसंद करते हैं?
मुझे औरतों से जो भी अटेंशन मिलती है, मैं उसे एंजॉय करता हूं. उनके बिना जिंदगी कुछ भी नहीं है. एक्टर बनने का एक बहुत बड़ा कारण यह रहा है कि औरतें आपको अपनी ड्रीम में देखती हैं. मोस्ट रिवाइडिंग थींग एक्टर होने की यह है. उनके बिना आपकी लाइफ में रंग नहीं आते.

 साभार: फिल्मफेयर

2 comments:

Lalit Chahar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
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हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल किया गया है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} (01-09-2013) को हम-भी-जिद-के-पक्के-है -- हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल चर्चा : अंक-002 पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा |
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सादर ....ललित चाहार

Seema Singh said...




इरफ़ान जी,ईश्वर अद्वैतवादी उसका साक्ष्य स्वरूप आत्मा है ऐसी मान्यता है आपने बचपन में आत्मा के स्वरूप में जो कुछ ईश्वर से माँगा उसे ईश्वर ने स्वीकार किया परिणामत: अफ़सोस …? सोचो जरा यहाँ ऐसे कितने तमाम लोग होगें जिन्होंने ईश्वर से आपकी ही तरह…? जनाब इन्सानी फितरत ही ऐसी होती है, जो होता है उसे तो कहता ही है कि मेरा है पर जो नहीं है उसे ईश्वर ने क्यों नहीं दिया इसके लिए जार-जार रोता, थोड़ा विस्तार में जाकर देखें तब पता चलता है कि यही न होने का शब्द -विचार शायद इंसान को आगे बढने को प्रेरित भी करता है !