Wednesday, November 4, 2009

सोचने पर विवश करती है मेरी फिल्में-मधुर भंडारकर

मधुर भंडारकर अपनी प्रत्येक फिल्म से समाज के एक खास वर्ग के कड़वे सच को उजागर करते हैं। चांदनी बार, सत्ता, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिग्नल और फैशन के बाद अब वे नई फिल्म जेल से भारतीय जेलों की हकीकत बयां करने आ रहे हैं। नील नितिन मुकेश और मुग्धा गोडसे अभिनीत जेल के संदर्भ में मधुर भंडारकर ने बातचीत की।

जेल फिल्म बनाने का विचार कैसे सूझा?
जेल फिल्म का विचार काफी सालों से मेरे दिमाग में था। मैं इसे फैशन से पहले बनाना चाहता था, लेकिन कुछ कारणों से मैं इसे तब नहीं बना सका। पांच छह महीने की रिसर्च और नए लेखकों के सहयोग से अब मैं जेल को बनाने में सफल हुआ हूं।
जेल किस तरह की फिल्म है?
यह मधुर की फिल्म है। इसकी अवधि दो घंटे आठ मिनट है। अब तक फिल्मों में लोगों ने लार्जर दैन लाइफ जेल देखा था, लेकिन मेरी फिल्म में पहली बार लोग रीयल जेल देखेंगे। यह मीडिल क्लास लड़के पराग दीक्षित की कहानी है। उसकी कहानी के जरिए मैंने जेल के पीछे की सच्चाई दिखायी है। ठाणे और पूना की जेल इसकी पृष्ठभूमि है। नितिन चन्द्रकांत देसाई ने जेल का बहुत अच्छा सेट डिजाइन किया है।
आपकी फिल्म में कितना प्रतिशत सच होता है और कितनी प्रतिशत कल्पना?
सत्तर प्रतिशत सच और तीस प्रतिशत कल्पना के मिश्रण से मेरी फिल्में बनती हैं। जेल में भी सच और कल्पना का इसी मात्रा में मिश्रण है।
जेल के लिए नील नितिन मुकेश और मुग्धा गोडसे को आपने क्यों चुना?
मैं हमेशा फिल्म के सब्जेक्ट के हिसाब से कलाकारों का चयन करता हूं। लोग हमेशा पूछते हैं कि आप स्टार कलाकारों के साथ काम क्यों नहीं करते? मेरी कहानी में स्टार फिट ही नहीं होते। पराग दीक्षित के किरदार के लिए मुझे ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो किसी इमेज में न बंधा हो। नील नितिन मुकेश मुझे स्यूटेबल लगे। वे बहुत टैलेंटेड हैं। मुग्धा ने फैशन में प्रियंका चोपड़ा और कंगना राणाउत की उपस्थिति में अपनी अलग पहचान बनाई। जेल से ये दोनों कलाकार बहुत आगे जाएंगे।
अपने सिनेमा को किस विधा में रखेंगे?
मैंने बीच की धारा का सिनेमा अपनाया है। मेरी फिल्मों को क्रिटकली और कामर्शियली सफलता मिलती है। तीन बार मुझे राष्टीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मैं अपने सिनेमा को समाज का आइना कहूंगा। मेरा सिनेमा समाज में जागरण पैदा करता है। साल्यूशन नहीं देता, लेकिन ऐसी चीजें सामने रखता है जो लोगों को सोचने पर विवश करती हैं।
क्या आप रियलिस्टिक फिल्ममेकर की पहचान से खुश हैं?
मैं खुश हूं, क्योंकि मैं कहीं जाता हूं तो लोग अपनी समस्याएं लेकर मेरे पास आते हैं। लोगों को विश्वास हो गया है कि मैं यदि किसी समस्या पर फिल्म बनाऊंगा तो लोग उसे देखेंगे, लेकिन अब मुझे खुद को रिइन्वेंट करने की जरूरत है। मैं एक प्रकार के सिनेमा से बंधकर नहीं रहना चाहता। अब मैं फिल्म मेकिंग का अपना स्टाइल बदलूंगा। मैं कॉमेडी और रोमांटिक फिल्में बनाना चाहता हूं।
जेल के बाद कौन सी फिल्म बनाएंगे?
अभी मैंने कुछ तय नहीं किया है। अवॉर्ड और क्रिकेट पर फिल्म बनाने की खबर अफवाह है।
-रघुवेन्द्र सिंह

1 comment:

महफूज़ अली said...

Bhaut achcha laga yeh vimarsh.......

Par yeh jitni bhi filmein banti hain.... hum bahut pehle dekh chuke hain.... jab bahut chote they.... hollywood ki filmon mein.... agar iska original dekhna hai.... to "BEHIND THE BARS" Antonellio ki zaroor dekhiye....... yeh 1991 mein release huyi thi....aur yeh JAIL uski Fotostate copy hai...... isliye yeh film hum 1991 mein jab chotey hi they ...tabhi dekh chukey they....

ab desi version dekh kar sar phodne ka hi mann kar raha hai.....