Saturday, May 7, 2011

मेरी अम्मा!

तेरह साल का था मैं. गर्मी की छुट्टी में मुझे और छोटे भाई सतेन्द्र को लेकर अम्मा मामा के घर गयीं. छुट्टी खतम होने के  पश्चात उन्होने मुझे नाना के साथ बरहज(देवरिया) भेज दिया अंग्रेजी माध्यम से पढाई करने के लिए. मैं  एक सप्ताह किसी तरह नाना के पास रहा. दिन-रात छुप-छुपकर रोता रहता था. हरदम अम्मा की याद आती थी. मैं पहली बार अम्मा से दूर हुआ था. नाना शनिवार को जैसे ही घर के लिए निकले, मैंने सोनू से मिन्नत की कि वे मुझे मेरे घर बगहीडाढ़ लेकर चलें. मैं अम्मा से मिल लूँगा और वे आज़मगढ़ जाकर अपने मम्मी-पापा से. उन्होने मुझसे कसम खिलवाई कि सोमवार की सुबह नाना के लौटने से पहले बरहज आ जाएंगे.  मैने कसम तो खाई लेकिन मैं लौटा नही. मैं अम्मा से दूर नही रहना चाहता था. अम्मा भी मुझसे एक सप्ताह दूर रहकर जान गई थी कि वे मुझसे दूर नही रह सकती. चाची ने बताया कि तुम्हारी अम्मा रोज रोती रहती थी, लग रह था जैसे बेटी विदा करके आई हैं. 

                                              (तस्वीर में मेरी अम्मा अपनी अम्मा के साथ )
मुझे और छोटे भाई को अम्मा अपने साथ लेकर सोती थी. गर्मी के दिनो में कभी-कभी मेरी आँख खुलती तो देखता कि वे बैठकर बेना डोला रही होती थी. शाम को रसोइघर में अपने पास बैठाकर वे मुझे पढाती थी. पन्द्रह अगस्त और छबीस जनवरी के लिए गाने याद करवाती थी. स्कूल जाता तो रोज एक या दो रुपये देती की कुछ खा लेना.  अम्मा सख्त बहुत थी. अगर सुन लेती कि मैं गोली खेल रहा था तो कमरा बन्द करके पिटाई करती थी. सतेन्द्र और मैं कई बार कमरे में साथ बन्द हुए थे. अगर घर का कोई दूसरा सदस्य हम पर हाथ उठाता तो अम्मा बर्दाश्त नही करती. वे समय की पाबन्द थी. शाम को अगर मैं दोस्तों के साथ् खेलने जाता तो एक समय सीमा में वे लौटने का आदेश देती थी. उनकी मर्जी के बिना हम कहीं नही जा सकते थे. वे हमेशा पढाई पर जोर देती. पढाई के लिए ही उन्होने मुझे खुद से दूर किया. ग्रेजुइशन के लिए उन्होने मुझे इलाहाबाद भेजा. इस बार वे सफल हुई, लेकिन उस वक्त से मैं अम्मा से दूर ही हूँ. लगभग आठ साल हो गए. इलाहाबाद, दिल्ली और अब मुम्बई.
जब  अम्मा ने मुझे खुद से दूर भेजा था तब मुझे बहुत गुस्सा...बहुत रोना आया था, लेकिन आज सोचता हूँ कि अगर अम्मा ने उस वक्त मुझे इलाहाबाद नही भेजा होता तो क्या मैं आज यहाँ होता? मुझे इलाहाबाद भेजने के लिए अम्मा को न सिर्फ पापा से बल्कि आजी-बाबा और घर के दूसरे लोगों से लड़ना पड़ा था. सयुंक्त परिवार था और अब तक घर का कोई लडका पढ्ने के लिए दूसरे शहर नही गया था. अम्मा ने सभी विरोधों का सामना किया यह कह्कर कि वे दूसरों का मुंह देखने के चक्कर में अपने बेटे का भविष्य नही खराब कर सकती.  आगे की पढाई के लिए इलाहाबाद से जब दिल्ली जाने की बात आई तो अम्मा ने एक बार फिर मोर्चा सम्भाला. पापा को राजी किया और मैं दिल्ली पहुँच गया. आजकल अम्मा की चिंताएं मेरे लिए दूसरे किस्म की हैं. अब वे जल्द से जल्द मेरी शादी देखना चाहती हैं. आजकल वे लड़कियाँ देख रही हैं. क्या अम्मा जितना फिक्र्मंद बेटे के लिए कोई दूसरा शक्स हो सकता है? जवाब ना ही है. क्योंकि अम्मा.....अम्मा होती हैं.
-रघुवेंद्र सिंह (अम्मा से जुडी चन्द बातें)




5 comments:

sonam said...

माँ का प्यार निश्छल होता है. आपकी इस छोटी से याद ने भाव-विभोर कर दिया...और याद दिलाया हमे की माँ से बेहतर और कोई भी नहीं...immandom

anukhyaan said...

Anupriya .. hum patrkar pray yah jaanne ki kosish mei lage rehte hin ki stars ke liye unki maa ki kya ehmiat hain. lekin apni maa ke baare mei kam hi likhte hain hum kabhi. aapne acha aur satik. kam shabdon mei behatrin baatein likhin hain. best post till now. really jisme honesty hai. na deadline ka dar hai, na banawatipan. i like it.

डॉ० डंडा लखनवी said...

भगवान राम ने शिव-धनुष तोंड़ा, कारसेवकों ने ढ़ाँचा तोड़ा, सचिन ने दूसरों का बनया रिकार्ड तोड़ा, अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा, प्रदर्शन-कारियों रेलवे-ट्रैक तोड़ा, विकास-प्राधिकरण ने झुग्गी झोपड़ियों को तोड़ा। तोड़ा-तोड़ी की परंपरा हमारे देश में पुरानी है। आपने कुछ तोड़ा नहीं अपितु माँ की ममता से खु़द को जोड़ा है। इस करुणा और ममता को बनाए रखिए। यह जीवन की पतवार है।
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

राजू मिश्र said...

बहुत भावप्रवण लिखते हो रघुवेंद्र जी ...अम्‍मा के बारे में पढ़ना शायद हर किसी को भाएगा। बढि़या लिखा है। जय हो।

राजू मिश्र said...

बहुत भावप्रवण लिखते हो रघुवेंद्र जी ...अम्‍मा के बारे में पढ़ना शायद हर किसी को भाएगा। बढि़या लिखा है। जय हो।