Saturday, May 16, 2009

मैं थी शरारत का पिटारा: माही गिल/बचपन

'देव डी' और 'गुलाल' फिल्म से दर्शकों का दिल जीतने वाली अभिनेत्री माही गिल नन्हीं उम्र में वैज्ञानिक बनने का सपना देखा करती थीं, लेकिन किस्मत अभिनय में ले आयी। सप्तरंग के पाठकों से माही शेयर कर रही हैं अपने चुलबुले बचपन की बातें-
[रहती थी चाचा-चाची के पास]
मैं अपने गांव की सबसे शरारती बच्ची थी। लोग मुझे शरारत का पिटारा कहते थे। गांव में मैं अपने चाचा-चाची के पास रहती थी। दरअसल, उनकी कोई संतान नहीं थी इसीलिए उन्होंने काफी समय तक मुझे अपने पास रखा। उन्हीं की देख-रेख में मैंने बचपन का अनमोल दौर जिया है।
[भैंस भी चराई है बचपन में]
मैं बचपन में दोस्तों के साथ भैंस चराने जाती थी। नदी में खूब नहाती थी। मैंने तैराकी वहीं सीखी। भैंसों को घर लाने के बाद उन्हें नाद पर बांधती और फिर चारा-पानी करती थी। मैंने गोबर के उपले भी पाथे हैं। बचपन में मैं साइकिल बहुत चलाती थी। खेतों की जुताई के वक्त ट्रैक्टर पर जरूर बैठती थी। बाद में मैं खुद ट्रैक्टर चलाना सीख गयी थी। चंडीगढ़ आने के बाद भी मैं गर्मी की छुंट्टी में गांव अवश्य जाती थी।
[डरती थी गणित से]
मैंने चंडीगढ़ के संत कबीर स्कूल से पढ़ाई की है। मैं पढ़ने में अच्छी थी। इतिहास और भूगोल विषय पढ़ने में मेरा खूब मन लगता था, लेकिन गणित का नाम सुनते ही पसीने छूटने लगते थे। गणित से मैं बहुत डरती थी। मैंने हर कक्षा प्रथम दर्जे में पास की है। हॉकी, फुटबॉल और बॉस्केट बॉल मेरे पसंदीदा खेल थे। बाद में मम्मी-पापा ने मुझे हॉस्टल में डाल दिया।
[हॉकी से करती थी पिटाई]
हॉस्टल में जाने के बाद मेरी शरारतें और बढ़ गयीं। वहां मैंने अपनी गैंग बना ली थी। जो कोई हमसे टकराता, उसकी हॉकी स्टिक से जमकर पिटाई करते थे। एक बार हमारी विरोधी गैंग ने हमसे पंगा ले लिया था। फिर क्या था? मैंने अपनी दोस्तों के साथ मिलकर हॉकी स्टिक से उनकी टांगें तोड़ दीं। बाद में स्कूल प्रशासन को दखलंदाजी करनी पड़ी और फिर हमारे बीच सुलह हुई।
[प्रभावित थी लेडी डायना से]
बचपन में मैं रात को छत पर सोती थी। देर रात तक सितारों को देखती रहती थी। उनसे प्यार इतना बढ़ा कि मैं वैज्ञानिक बनने के सपने देखने लगी। थोड़ी बड़ी हुई तो लेडी डायना, रेखा तथा जीनत अमान से प्रभावित हुई। उन्हीं की तरह बनने के सपने संजोने लगी।
[मिस करती हूं बचपन]
मैंने बचपन को बहुत अच्छी तरह जिया है इसलिए आज उस समय को मिस करती हूं। जब मैं सत्रह वर्ष की थी तब पहली बार लगा कि अब मैं बड़ी हो गयी। बचपन में खाने-पीने पर ध्यान अधिक रहता था, लेकिन बड़े होने पर सजने-संवरने का शौक हो गया। मैं बच्चों से कहना चाहूंगी कि वे बचपन को जी भर के जीएं, क्योंकि वे पल दोबारा नहीं आते।
-रघुवेंद्र सिंह

2 comments:

अनिल कान्त : said...

inke baare mein padhkar achchha laga

इरशाद अली said...

आज ही किसी अखबार में भी ये इंटरव्यू पढ़ा। लेकिन क्या अखबार वाली तस्वीर माही की ही थी। इंटरव्यू तो अच्छा था लेकिन परम्परागत् सा नही लगा आपको। माही कही ज्यादा बोल्ड और बिंदास है और इस पूरे साक्षात्कार में यही बात गायब हैं।